भारतकोश
ब्रह्मचर्य - स्वस्थ व सुखमय साधना

ब्रह्मचर्य - स्वस्थ व सुखमय साधना

Brahmacharya - Swasth Va Sukhmay Sadhana

प्रेमवल्लभा शरण द्वारा

स्रोत: 2019 Shri Hit Radha Keli Kunj Trust edition · श्री हित राधा केलि कुञ्ज ट्रस्ट, वृन्दावन · 2019 (उद्गम)

DevanagariHindipublished74 पृष्ठ

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जैसे नामाचार्य श्रीहरिदास ठाकुर जी की नवीन तरुण अवस्था है, वलिष्ठ शरीर है, एकांत में बैठकर भजन में निमग्न हैं, उनसे द्वेष करने वाले रामचंद्र खों ने उन्हें भ्रष्ट करने के लिए आदृत श्रृंगार से सुसज्जित नवयुवती वेश्या को उनके पास भेजा । वह ३ रात्रि लगातार एकांत में उनके पास आई लेकिन उनका मन एक बार भी चलायमान नहीं हुआ अर्थात् उसकी ओर आकर्षित नहीं हुआ अपितु महामंत्र के श्रवण से एवं उन महापुरुष के दर्शन के प्रभाव से उस वेश्या का ही चित्त परिवर्तित हो गया और वह वेश्यावृत्ति त्यागकर प्रभु की महान भक्ता बन गयी ।

इसलिए प्रभु की भक्ति में कितना बल है, संसारी लोग जिन विषय-सुखों की प्राप्ति के लिए अनेकानेक प्रयत्न करते हैं किन्तु प्रभु का प्रेमी भक्त उन्हीं विषय-सुखों को विषवत्, वमनवत् अथवा मलवत् छोड़ देता है । गोस्वामी तुलसीदास जी मानस जी में प्रेममूर्ति श्रीभरतलालजी के बारे में लिखते हैं -

भूषन बसन भोग सुख भूरी । मन तन वचन तजे तिन तूरी ॥ अवध राजु सुर राजु सिहाई । दसरथ धनु सुनि धनदु लजाई ॥ तेहिं पुर बसत भरत बिनु रागा । चंचरीक जिमि चंपक बागा ॥ रमा बिलासु राम अनुरागी । तजत बमन जिमि जन बड़भागी ॥

‘श्रीभरतजी ने गहने-कपड़े और अनेकों प्रकार के भोग-सुखों को मन, तन और वचन से तृण तोड़कर यानी प्रतिज्ञा करके त्याग दिया । जिस अयोध्या के राज्य को देवराज इन्द्र सिहाते हैं और जिन दशरथजी की सम्पत्ति को सुनकर कुबेर भी लजा जाते हैं; उसी अयोध्यापुरी में भरतजी अनासक्त होकर इस प्रकार निवास कर रहे हैं, जैसे चम्पा के बाग में भौरा रहता है ।

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