भारतकोश
ब्रह्मचर्य - स्वस्थ व सुखमय साधना

ब्रह्मचर्य - स्वस्थ व सुखमय साधना

Brahmacharya - Swasth Va Sukhmay Sadhana

प्रेमवल्लभा शरण द्वारा

स्रोत: 2019 Shri Hit Radha Keli Kunj Trust edition · श्री हित राधा केलि कुञ्ज ट्रस्ट, वृन्दावन · 2019 (उद्गम)

DevanagariHindipublished74 पृष्ठ

पृष्ठ 59, कुल 74 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 59

अतः गोस्वामी तुलसीदास जी कहते हैं कि श्रीरामचन्द्रजी के प्रेमी बड़भागी पुरुष लक्ष्मी के विलास (भोगैश्वर्य) को वमन की भाँति त्याग देते हैं।'

इसी तरह से श्रीमद्भागवत में भी ऋषभनन्दन श्रीभरतजी के विषय में लिखा है -

यो दुस्त्यजान्दारसुतान् सुहृद्राज्यं हृदिस्पृशः ।

जहौ युवैव मलवदुत्तमश्लोकलालसः ॥ (भा. ५/१४/४३)

'उन्होंने पुण्यकीर्ति भगवान् श्रीकृष्ण को प्राप्त करने की इच्छा से अत्यन्त मनोरम तथा दुस्त्यज (कठिनाई से त्यागने योग्य) स्त्री-पुत्रादि, मित्र और राज्य को युवावस्था में ही विष्ठा के समान त्याग दिया।'

सारे विषय-सुख श्रीरघुनाथदास जी के घर में थे। घरवालों ने देखा कि ये तो प्रभु की भक्ति की तरफ आकर्षित हो रहा है तो उन्होंने उनका विवाह एक अत्यन्त सुन्दर नवयुवती कन्या से करवा दिया, लेकिन रघुनाथदास जी ने उस कन्या की तरफ देखा भी नहीं; क्योंकि उनका चित्त श्यामसुन्दर की तरफ मचल पड़ा था। सारे भोग उनको बड़े कष्टदायी लगते थे और एक दिन वे उन सब भोगों को छोड़कर घर से भजन के लिए भाग निकले।

अब विचार करो, जिन भोगों की प्राप्ति के लिए लोग जाने क्या-क्या नहीं करते हैं, भक्त को सहज में प्राप्त होने पर भी वह उन्हें स्वीकार नहीं करता है।

इसलिए व्यायाम-प्राणायाम और सात्त्विक आहार ब्रह्मचर्य धारण करने में सहायक जरूर है लेकिन मुख्य बात है चिन्तन बदलना; बाकी ये सब गौड़ बातें हैं। यदि हमारा चिन्तन विषयों का बना रहा तो हम ब्रह्मचर्य को रोक पाने में समर्थ नहीं हो सकते हैं, अतः चिन्तन

53

Scanned with CamScanner