ब्रह्मचर्य - स्वस्थ व सुखमय साधना
Brahmacharya - Swasth Va Sukhmay Sadhana
प्रेमवल्लभा शरण द्वारा
स्रोत: 2019 Shri Hit Radha Keli Kunj Trust edition · श्री हित राधा केलि कुञ्ज ट्रस्ट, वृन्दावन · 2019 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें(४) लघुशंका एवं शौच के वेग को कभी रोकना नहीं चाहिए तथा लघुशंका के उपरान्त जननेन्द्रिय पर कुछ पानी डालना चाहिए और हाथ-पैर धोकर आचमन करना चाहिए।
(५) सदैव साधन परायण रहना चाहिए यानी मन को कभी भी खाली नहीं छोड़ना चाहिए।
(६) ब्रह्मचर्य संयम के लिए शारीरिक श्रम करना अत्यन्त अनिवार्य है, जो उपासकजन हैं, वे नित्य धाम की परिक्रमा, आश्रम आदि की शरीर से सेवा अवश्य करें।
(७) व्यायाम-प्राणायाम आदि किसी योगाचार्य से समझकर ही करें।
(८) सबका मूल है - भगवत्तम जप, इससे शीघ्र अन्तःकरण शुद्ध हो जाता है और ब्रह्मचर्य धारण करने की सामर्थ्य प्राप्त होती है।
(९) अत्यन्त आवश्यकता पड़ने पर ही किसी का स्पर्श करना चाहिए, अन्यथा उपासक किसी का स्पर्श न करे।
(१०) शरीर से शौचाचार का पूर्ण पालन करना चाहिए यानी शारीरिक पवित्रता पर भी पूर्ण ध्यान देना चाहिए।
(११) यदि दुग्ध पान करना है तो रात्रि में सोने से १ घण्टे पहले दूध पियें, अगर बहुत आवश्यकता हो तो थोड़ी-सी चीनी मिलायें, अन्यथा नहीं, एवं दूध अधिक गर्म नहीं होना चाहिए।
विचारों का संयम - यह ब्रह्मचर्य का मूल है, कोई व्यायाम-आसन-प्राणायाम कितना भी करता रहे यदि उसके विचारों का संयम नहीं है तो वह ब्रह्मचर्य कभी धारण नहीं कर सकता है। विचारों के संयम के लिए नित्य सत्संग करना एवं उत्तम ग्रंथों अर्थात् सत्साक्षों का नित्य स्वाध्याय करना आवश्यक है, क्योंकि उनसे हृदय में उत्तम भावनाओं का उदय होता है और मन में दूषित विचार आने कम हो जाते हैं।
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