भारतकोश
ब्रह्मचर्य - स्वस्थ व सुखमय साधना

ब्रह्मचर्य - स्वस्थ व सुखमय साधना

Brahmacharya - Swasth Va Sukhmay Sadhana

प्रेमवल्लभा शरण द्वारा

स्रोत: 2019 Shri Hit Radha Keli Kunj Trust edition · श्री हित राधा केलि कुञ्ज ट्रस्ट, वृन्दावन · 2019 (उद्गम)

DevanagariHindipublished74 पृष्ठ

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ब्रह्मचर्य में लाभकारी आहार एवं दिनचर्या

युक्ताहारविहारस्य युक्तचेष्टस्य कर्मसु ।

युक्तस्वप्नावबोधस्य योगो भवति दुःखहा ॥ (गी. ६/१७)

‘जो साधक युक्त-आहार और युक्त-विहार करने वाला है, कर्मों में यथायोग्य चेष्टा करने वाला है तथा परिमित शयन और जागरण करता है, ऐसे योगी का ‘योग’ उसके समस्त दुःखों का नाश कर देता है।’

ब्रह्मचर्य साधने के लिए सर्वप्रथम आवश्यक है – खान-पान का संयम। शास्त्रों में लिखा है – को रुक्, को रुक्, को रुक् ? अर्थात् कौन स्वस्थ है तो इसका उत्तर है – हितभुक्, मितभुक्, ऋतभुक् । अर्थात् हितभुक् (हितकार भोजन ग्रहण करने वाला), मितभुक् (भूख से कम खाने वाला) और ऋतभुक् (न्याय-नीति से कमाया हुआ खाने वाला) ।

श्रुतियों में लिखा है – ‘अन्नमयं हि सौम्य मनः’ – अन्न के सूक्ष्मांश से मन का निर्माण होता है । इसलिए ‘आहार शुद्धौ सत्व शुद्धिः’ आहार शुद्ध होने से अन्तःकरण शुद्ध होता है अर्थात् सतोगुण की वृद्धि होती है और शुद्ध मन के द्वारा ही ब्रह्मचर्य सम्भव है । इसलिए ब्रह्मचर्य और भोजन में अत्यन्त घनिष्ठ सम्बन्ध है । ब्रह्मचर्य के इच्छुक साधक को सादा, सात्विक और अल्पाहारी होना चाहिए, राजसी-तामसी आहार का पूर्णतया त्याग कर देना चाहिए अन्यथा वह वीर्य धारण नहीं कर सकता । भगवान् ने गीता जी में सात्विक-राजसादि आहार का वर्णन किया है –

आयुः सत्त्वबलारोग्यसुखप्रीतिविवर्धनाः । रस्याः स्निग्धाः स्थिरा हृद्या आहाराः सात्विकप्रियाः ॥ (१७/८)

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