भारतकोश
ब्रह्मचर्य - स्वस्थ व सुखमय साधना

ब्रह्मचर्य - स्वस्थ व सुखमय साधना

Brahmacharya - Swasth Va Sukhmay Sadhana

प्रेमवल्लभा शरण द्वारा

स्रोत: 2019 Shri Hit Radha Keli Kunj Trust edition · श्री हित राधा केलि कुञ्ज ट्रस्ट, वृन्दावन · 2019 (उद्गम)

DevanagariHindipublished74 पृष्ठ

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जैसे कोई साधक कहे हम तो किसी माता-बहिन को भगवद्भाव से देखते हैं लेकिन शास्त्र इसके लिए भी निषेध करता है । अगर धोखे से दृष्टि चली जाय तो उनमें भगवद्भाव करो लेकिन उनकी तरफ भगवद्भाव से भी नहीं देखो अन्यथा भ्रष्ट होने के पूर्ण अवसर होते हैं ।

श्रीलक्ष्मण जी इसी मर्यादा से चलते थे । ऋष्यमूक पर्वत पर जब सुग्रीव जी ने राम जी को सीता जी के आभूषण दिखाए तो प्रभु श्रीराम ने लक्ष्मण जी को दिखाकर कहा कि पहचानो क्या ये आभूषण सीता के ही हैं ? तब लक्ष्मण जी ने कहा -

नाहं जानामि केयूरे नाहं जानामि कुण्डले ।

नूपुरेत्वभिजानामि नित्यं पादाभिवन्दनात् ॥ (वाल्मीकि रामायण)

‘हे प्रभो! मैं इन बाजूबन्दों को नहीं जानता और न ही इन कुण्डलों को जानता हूँ । हाँ, इन विछुओं (नूपुरों) को अवश्य पहचानता हूँ, क्योंकि चरण-वंदना करते इन्हें नित्य देखा करता था ।’ अर्थात् लक्ष्मण जी ने सीता जी के चरणों के अलावा उन्हें दृष्टि उठाकर नहीं देखा । भ्रष्ट वही साधक होता है जो शास्त्र और गुरु की आज्ञा का उल्लंघन करता है, यदि इनकी आज्ञानुसार व्यवहार हो तो कभी नाश या पतन नहीं हो सकता है । अगर कभी किसी स्त्री के प्रति भूल से नेत्र जाएँ तो तत्काल उनमें भगवती का भाव या माता का भाव करो । ये आद्यशक्ति जगदम्बा की अंश स्वरूपा हैं-‘विद्याः समस्तास्तव देवि भेदाः स्त्रियाः समस्ताः सकला जगत्सु ।’ कोशिश कीजिये उनके मस्तक, नेत्र और केशों पर दृष्टि न जाए, केवल चरणों पर दृष्टि रहे । ज्यादा देर वार्ता मत करो, एकांत में वार्ता मत करो । जहाँ दृष्टि जाए तत्काल नेत्र हटा लो, अगर दर्शन होते ही आपने कामभाव से देख लिया तो आप ब्रह्मचारी नहीं रह सकते या वह साधिका ब्रह्मचारिणी नहीं रह सकती, जिसने पुरुष को कामभाव से देख लिया ।

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