ब्रह्मचर्य - स्वस्थ व सुखमय साधना
Brahmacharya - Swasth Va Sukhmay Sadhana
प्रेमवल्लभा शरण द्वारा
स्रोत: 2019 Shri Hit Radha Keli Kunj Trust edition · श्री हित राधा केलि कुञ्ज ट्रस्ट, वृन्दावन · 2019 (उद्गम)
पृष्ठ 45, कुल 74 में से
संदर्भ में पढ़ेंजब तक पूर्ण भगवदाकार वृत्ति नहीं हो जाती, तब तक 'काम' का संस्कार रहता ही है क्योंकि पूर्व जन्म-जन्मान्तरो के संस्कार चित्त पर जमा हैं। लेकिन जब हम सावधानी पूर्वक चलेंगे तो एक दिन ऐसा आयेगा कि हृदय एक दम शान्त और निर्मल होने लगेगा, संस्कार तनुत्व (कमजोर) अवस्था को जैसे-जैसे प्राप्त होंगे तो तरंगों की भाँति हो जायेंगे और फिर अन्ततोगत्वा दग्धबीज हो जायेंगे।
न मव्यावेशितधियां कामः कामाय कल्पते ।
भर्जिता कथिता धाना प्रायो बीजाय नेष्यते ॥ (भा. १०/२२/२६)
‘जिनकी बुद्धि प्रभु में लगी हुयी है उनके अन्दर काम पैदा नहीं हो सकता। जैसे जिन बीजों को भून या उबाल दिया जाता है, वे अंकुर के रूप में उगने योग्य नहीं रह जाते हैं।’ किन्तु ये संस्कार बहुत दूर तक रहते हैं, जब तक भगवत्प्राप्ति नहीं होती तब तक रहते ही हैं। चिंगारी रूप से बने रहते हैं और जहाँ इनको हवा और ईधन मिला तो ज्वाला रूप हो जाते हैं। श्रीनारदजी महाराज कह रहे हैं कि जब उनको संयोग मिलता है तो वे समुद्र की भाँति हो जाते हैं – ‘तरंगायिता अपीमे संगाल्समुद्रायन्ति ॥’ ‘अर्थात् दुःसंग से ये (कामक्रोधादि) तरंग रूप से समुद्र जैसे विशालकाय रूप ग्रहण कर लेते हैं।’ कोई ये न समझ ले कि अवस्था से इनका नाश होता है। अवस्था से नहीं अपितु भगवत्प्राप्ति से नाश होता है, अब भगवत्प्राप्ति जब हो जाए तब आप निष्काम हो जायेंगे। जो भगवत्प्राप्त महापुरुष हैं त्रिकाल में ऐसा नहीं हो सकता कि कोई विकार आकर के अपना प्रभाव उनके ऊपर दिखा सके। जहाँ अभी थोड़ा भी जीवत्व है तो ये चिंगारी रूप में रहते हैं। यद्यपि चिंगारी में ताकत नहीं है लेकिन अगर उसको मसाला (ईधन) मिल जाए तो ज्वाला होने में देर नहीं लगती है। इसलिए जो अच्छे भजनानंदी साधक होते हैं वह भी डरते रहते हैं विषयों से।
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