ब्रह्मचर्य - स्वस्थ व सुखमय साधना
Brahmacharya - Swasth Va Sukhmay Sadhana
प्रेमवल्लभा शरण द्वारा
स्रोत: 2019 Shri Hit Radha Keli Kunj Trust edition · श्री हित राधा केलि कुञ्ज ट्रस्ट, वृन्दावन · 2019 (उद्गम)
जब तक पूर्ण भगवदाकार वृत्ति नहीं हो जाती, तब तक 'काम' का संस्कार रहता ही है क्योंकि पूर्व जन्म-जन्मान्तरो के संस्कार चित्त पर जमा हैं। लेकिन जब हम सावधानी पूर्वक चलेंगे तो एक दिन ऐसा आयेगा कि हृदय एक दम शान्त और निर्मल होने लगेगा, संस्कार तनुत्व (कमजोर) अवस्था को जैसे-जैसे प्राप्त होंगे तो तरंगों की भाँति हो जायेंगे और फिर अन्ततोगत्वा दग्धबीज हो जायेंगे।
न मव्यावेशितधियां कामः कामाय कल्पते ।
भर्जिता कथिता धाना प्रायो बीजाय नेष्यते ॥ (भा. १०/२२/२६)
‘जिनकी बुद्धि प्रभु में लगी हुयी है उनके अन्दर काम पैदा नहीं हो सकता। जैसे जिन बीजों को भून या उबाल दिया जाता है, वे अंकुर के रूप में उगने योग्य नहीं रह जाते हैं।’ किन्तु ये संस्कार बहुत दूर तक रहते हैं, जब तक भगवत्प्राप्ति नहीं होती तब तक रहते ही हैं। चिंगारी रूप से बने रहते हैं और जहाँ इनको हवा और ईधन मिला तो ज्वाला रूप हो जाते हैं। श्रीनारदजी महाराज कह रहे हैं कि जब उनको संयोग मिलता है तो वे समुद्र की भाँति हो जाते हैं – ‘तरंगायिता अपीमे संगाल्समुद्रायन्ति ॥’ ‘अर्थात् दुःसंग से ये (कामक्रोधादि) तरंग रूप से समुद्र जैसे विशालकाय रूप ग्रहण कर लेते हैं।’ कोई ये न समझ ले कि अवस्था से इनका नाश होता है। अवस्था से नहीं अपितु भगवत्प्राप्ति से नाश होता है, अब भगवत्प्राप्ति जब हो जाए तब आप निष्काम हो जायेंगे। जो भगवत्प्राप्त महापुरुष हैं त्रिकाल में ऐसा नहीं हो सकता कि कोई विकार आकर के अपना प्रभाव उनके ऊपर दिखा सके। जहाँ अभी थोड़ा भी जीवत्व है तो ये चिंगारी रूप में रहते हैं। यद्यपि चिंगारी में ताकत नहीं है लेकिन अगर उसको मसाला (ईधन) मिल जाए तो ज्वाला होने में देर नहीं लगती है। इसलिए जो अच्छे भजनानंदी साधक होते हैं वह भी डरते रहते हैं विषयों से।
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जैसे कोई साधक कहे हम तो किसी माता-बहिन को भगवद्भाव से देखते हैं लेकिन शास्त्र इसके लिए भी निषेध करता है । अगर धोखे से दृष्टि चली जाय तो उनमें भगवद्भाव करो लेकिन उनकी तरफ भगवद्भाव से भी नहीं देखो अन्यथा भ्रष्ट होने के पूर्ण अवसर होते हैं ।
श्रीलक्ष्मण जी इसी मर्यादा से चलते थे । ऋष्यमूक पर्वत पर जब सुग्रीव जी ने राम जी को सीता जी के आभूषण दिखाए तो प्रभु श्रीराम ने लक्ष्मण जी को दिखाकर कहा कि पहचानो क्या ये आभूषण सीता के ही हैं ? तब लक्ष्मण जी ने कहा -
नाहं जानामि केयूरे नाहं जानामि कुण्डले ।
नूपुरेत्वभिजानामि नित्यं पादाभिवन्दनात् ॥ (वाल्मीकि रामायण)
‘हे प्रभो! मैं इन बाजूबन्दों को नहीं जानता और न ही इन कुण्डलों को जानता हूँ । हाँ, इन विछुओं (नूपुरों) को अवश्य पहचानता हूँ, क्योंकि चरण-वंदना करते इन्हें नित्य देखा करता था ।’ अर्थात् लक्ष्मण जी ने सीता जी के चरणों के अलावा उन्हें दृष्टि उठाकर नहीं देखा । भ्रष्ट वही साधक होता है जो शास्त्र और गुरु की आज्ञा का उल्लंघन करता है, यदि इनकी आज्ञानुसार व्यवहार हो तो कभी नाश या पतन नहीं हो सकता है । अगर कभी किसी स्त्री के प्रति भूल से नेत्र जाएँ तो तत्काल उनमें भगवती का भाव या माता का भाव करो । ये आद्यशक्ति जगदम्बा की अंश स्वरूपा हैं-‘विद्याः समस्तास्तव देवि भेदाः स्त्रियाः समस्ताः सकला जगत्सु ।’ कोशिश कीजिये उनके मस्तक, नेत्र और केशों पर दृष्टि न जाए, केवल चरणों पर दृष्टि रहे । ज्यादा देर वार्ता मत करो, एकांत में वार्ता मत करो । जहाँ दृष्टि जाए तत्काल नेत्र हटा लो, अगर दर्शन होते ही आपने कामभाव से देख लिया तो आप ब्रह्मचारी नहीं रह सकते या वह साधिका ब्रह्मचारिणी नहीं रह सकती, जिसने पुरुष को कामभाव से देख लिया ।
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ब्रह्मचर्य में लाभकारी आहार एवं दिनचर्या
युक्ताहारविहारस्य युक्तचेष्टस्य कर्मसु ।
युक्तस्वप्नावबोधस्य योगो भवति दुःखहा ॥ (गी. ६/१७)
‘जो साधक युक्त-आहार और युक्त-विहार करने वाला है, कर्मों में यथायोग्य चेष्टा करने वाला है तथा परिमित शयन और जागरण करता है, ऐसे योगी का ‘योग’ उसके समस्त दुःखों का नाश कर देता है।’
ब्रह्मचर्य साधने के लिए सर्वप्रथम आवश्यक है – खान-पान का संयम। शास्त्रों में लिखा है – को रुक्, को रुक्, को रुक् ? अर्थात् कौन स्वस्थ है तो इसका उत्तर है – हितभुक्, मितभुक्, ऋतभुक् । अर्थात् हितभुक् (हितकार भोजन ग्रहण करने वाला), मितभुक् (भूख से कम खाने वाला) और ऋतभुक् (न्याय-नीति से कमाया हुआ खाने वाला) ।
श्रुतियों में लिखा है – ‘अन्नमयं हि सौम्य मनः’ – अन्न के सूक्ष्मांश से मन का निर्माण होता है । इसलिए ‘आहार शुद्धौ सत्व शुद्धिः’ आहार शुद्ध होने से अन्तःकरण शुद्ध होता है अर्थात् सतोगुण की वृद्धि होती है और शुद्ध मन के द्वारा ही ब्रह्मचर्य सम्भव है । इसलिए ब्रह्मचर्य और भोजन में अत्यन्त घनिष्ठ सम्बन्ध है । ब्रह्मचर्य के इच्छुक साधक को सादा, सात्विक और अल्पाहारी होना चाहिए, राजसी-तामसी आहार का पूर्णतया त्याग कर देना चाहिए अन्यथा वह वीर्य धारण नहीं कर सकता । भगवान् ने गीता जी में सात्विक-राजसादि आहार का वर्णन किया है –
आयुः सत्त्वबलारोग्यसुखप्रीतिविवर्धनाः । रस्याः स्निग्धाः स्थिरा हृद्या आहाराः सात्विकप्रियाः ॥ (१७/८)
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‘रसयुक्त (फल, शकर, बताशा व दुग्धादि), चिकने (घी, किसमिस आदि), स्थिर रहने वाले (जिस भोजन का सार शरीर में बहुत काल तक रहे) तथा हृदय को बल देने वाले आहार – ये सात्विक आहार हैं। इनसे आयु, सत्त्वगुण, बल, आरोग्य, सुख और प्रीति की वृद्धि होती है।’ कदम्ललवणाल्युष्णतीक्ष्णरूक्षविदाहिनः।
आहारा राजसस्येष्टा दुःखशोकामयप्रदाः ॥ (१७/८)
‘कड़वे, खट्टे, लवणयुक्त, बहुत गरम, तीखे, रूखे, दाहकारक आहार – ये राजस आहार हैं। ये दुःख, शोक तथा रोगों को उत्पन्न करने वाले हैं।’ अर्थात् ब्रह्मचर्य के लिए बहुत हानिकारक हैं।
ब्रह्मचर्य में लाभप्रद आहार –
अन्न - जौ, गेहूँ, साठी, मूँग, अरहर, चना आदि। फल - (ऋतु के फल) सेब, अमरुद, पपीता, नासपाती, केला, नारियल, सिंघाड़ा, अनार, बेल आदि। शाक - (ऋतु के अनुसार) घिया (लौकी), परवल, तोरई, मटर, शिमला मिर्च, कद्दू, टिंडा, मूली, खीरा आदि।
ब्रह्मचर्य के लिए निषिद्ध खाद्य पदार्थ –
लाल मिर्च, गरम मशाला, राजमा, सोयाबीन एवं सोयाबीन बड़ी, मसूर दाल, साबुद उड़द, मशरूम, गाजर, चुकन्दर, मूगफली, काजू, बादाम, अखरोट, गुड़, प्याज, लहसुन, अचार, अत्यधिक उष्ण (गर्म), खट्टे, मीठे, नमकीन एवं तले हुए पदार्थ, पिज्जा, बर्गर, कचौड़ी-समोसा, मालपूआ, गरिष्ठ आहार, कोल्ड ड्रिंक्स एवं नशीले पदार्थ आदि।
ब्रह्मचर्य-साधना करने वाले को २४ घंटे में ज्यादा-से-ज्यादा दो बार भोजन करना चाहिए और जितनी भूख हो उससे आधा भोजन करना चाहिए, पेट भरकर खाना उचित नहीं है। दिन का भोजन दोपहर १ बजे से पूर्व एवं रात्रि का भोजन ८ बजे से पहले कर लेना चाहिए।
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भोजन पाते समय चिंतन दूषित नहीं होना चाहिए । मध्यान्ह भोजन के बाद १०-१५ मिनिट बारीं करवट लेटें एवं रात्रि भोजन के बाद थोड़ा टहलना आवश्यक है ।
साधक को २४ घंटे में कम से कम ३ से ५ लीटर और गर्मियों में ५ से ७ लीटर पानी पीना चाहिए । पानी बैठकर, मुँह से पात्र लगाकर, चुस्की लेकर, धीरे-धीरे मुँह में घुमाते हुए, घूँट-घूँट करके पीना चाहिए ताकि लार अन्दर जा सके, वह लाभकारी होती है । पानी सामान्य या हल्का गुनगुना पीना चाहिए परन्तु ठंडा (वर्फ डला या फ्रिज आदि का) पानी कदापि नहीं पीना चाहिए । खाना खाने के १ घंटे पहले या भोजन कर लेने के १ घंटे बाद पानी पीना चाहिए, भोजन के साथ नहीं और न ही भोजन करने के तुरंत बाद क्योंकि 'भोजनान्ते विषं वारि' भोजन के तुरंत बाद पानी पीना विष की तरह है; अगर भोजन के बीच में अति आवश्यकता हो तो बिल्कुल थोड़ा-सा पानी ले सकते हैं । खड़े होकर या लेटकर कभी पानी न पियें ।
ब्रह्मचर्य के लिए उपयोगी दिनचर्या – साधक को ब्रह्ममुहूर्त से पूर्व यानी ४ बजे तक उठ जाना चाहिये क्योंकि चार बजे के बाद ही अधिकांश ब्रह्मचर्य क्षीण होता है, जो ६ बजे तक सोते रहते हैं, वे ब्रह्मचारी कभी नहीं बन सकते; इसलिए रात्रि में जल्दी शयन और प्रातः जल्दी जगने का साधक को अभ्यास डालना चाहिये ।
उठने के बाद साधक को खाली पेट, बिना कुल्ला किये, काकासन या बज्रासन में बैठकर कम से कम १ से २ लीटर तक हल्का गर्म (गुनगुना) जल पीना चाहिए, इसे ऊषापान कहते हैं । यह बहुत ही लाभकारी अमृततुल्य होता है । यदि कब्ज हो तो थोड़ा नमक डालकर पीना चाहिये । ऊषापान के लिए सम्भव हो तो रात्रि में सोते समय ताँबे के पात्र में जल-भरकर ढककर उसे रख दें और प्रातःकाल
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उठते ही उसको पियें । फिर कुछ समय थोड़ा टहलें अथवा बज्रासन पर बैठें; तत्पश्चात् दैनिक कृत्य शौच-स्नानादि करें ।
नहाने से पहले नाभि पर जलधार डालें, फिर अच्छे से घर्षण करके नहायें, और ज्यादा गर्म पानी का उपयोग स्नान के लिए न करें, प्रतिदिन २ बार स्नान करें । प्रातःकाल स्नानादि से निवृत्त होकर कुछ व्यायाम-प्राणायाम आदि करें ।
जिसे ब्रह्मचर्य का पालन करना है उसे नियमित व्यायाम करना अर्थात् शरीर को थकाना अत्यन्त ही आवश्यक है ।
ब्रह्मचर्य-संयम में सहायक आसन एवं प्राणायाम –
आसन – १. ब्रह्मचर्यासन, २. सिद्धासन, ३. बज्रासन, ४. पद्मासन, ५. पादपश्चिमोत्तानासन, ६. शीर्षासन, ७. जानुशिरासन, ८. पादांगुष्ठासन, ९. द्विपाद चक्रासन, १०. नाभ्यासन, ११. उत्थितएकैक-पादासन, १२. सम्प्रसारण भू नमनासन ।
(क्रमशः आसनों के चित्र)
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प्राणायाम – अनुलोम-विलोम, कपालभाति, भस्त्रिका आदि ।
व्यायाम-प्राणायाम के तुरंत बाद लघुशंका अवश्य जाएँ और कम से कम ३० मिनिट तक कुछ खाएँ-पिएँ नहीं ।
औषधि सेवन – आंवला, त्रिफला चूर्ण एवं प्रातःकाल स्नानोपरान्त १ तुलसी की पत्ती पाएँ तथा शाम के समय १ नीम की पत्ती पाएँ, अगर वह पचने लगे तो धीरे-धीरे पाचन के अनुसार उनकी मात्रा में १० पत्तियों तक वृद्धि कर सकते हैं, ये बहुत लाभकारक औषधी है अथवा वीर्य पुष्टता के लिए आयुर्वेदिक चिकित्सकों के परामर्श से कुछ दिनों के लिए औषधी ले लें और सेवन-विधि के अनुसार उसका सेवन करें ।
विशेष –
- (१) सूर्य नमस्कार एवं मूलबंध लगाना ब्रह्मचर्य में बहुत सहायक है ।
- (२) यदि संभव हो सके तो लँगोट (कौपीन) एवं खड़ाऊँ धारण करें ।
- (३) ब्रह्मचर्य पालन करने वाले साधक को कभी दिन में सोना नहीं चाहिए यदि रात्रि में नींद पूरी नहीं हुई हो तो १ घंटे विश्राम कर लें अन्यथा नहीं; एवं रात्रि में भी लघुशंका से निवृत्त होकर हाथ-पैर धुलकर, यदि सम्भव हो तो बायीं करवट सोना चाहिए ।
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(४) लघुशंका एवं शौच के वेग को कभी रोकना नहीं चाहिए तथा लघुशंका के उपरान्त जननेन्द्रिय पर कुछ पानी डालना चाहिए और हाथ-पैर धोकर आचमन करना चाहिए।
(५) सदैव साधन परायण रहना चाहिए यानी मन को कभी भी खाली नहीं छोड़ना चाहिए।
(६) ब्रह्मचर्य संयम के लिए शारीरिक श्रम करना अत्यन्त अनिवार्य है, जो उपासकजन हैं, वे नित्य धाम की परिक्रमा, आश्रम आदि की शरीर से सेवा अवश्य करें।
(७) व्यायाम-प्राणायाम आदि किसी योगाचार्य से समझकर ही करें।
(८) सबका मूल है - भगवत्तम जप, इससे शीघ्र अन्तःकरण शुद्ध हो जाता है और ब्रह्मचर्य धारण करने की सामर्थ्य प्राप्त होती है।
(९) अत्यन्त आवश्यकता पड़ने पर ही किसी का स्पर्श करना चाहिए, अन्यथा उपासक किसी का स्पर्श न करे।
(१०) शरीर से शौचाचार का पूर्ण पालन करना चाहिए यानी शारीरिक पवित्रता पर भी पूर्ण ध्यान देना चाहिए।
(११) यदि दुग्ध पान करना है तो रात्रि में सोने से १ घण्टे पहले दूध पियें, अगर बहुत आवश्यकता हो तो थोड़ी-सी चीनी मिलायें, अन्यथा नहीं, एवं दूध अधिक गर्म नहीं होना चाहिए।
विचारों का संयम - यह ब्रह्मचर्य का मूल है, कोई व्यायाम-आसन-प्राणायाम कितना भी करता रहे यदि उसके विचारों का संयम नहीं है तो वह ब्रह्मचर्य कभी धारण नहीं कर सकता है। विचारों के संयम के लिए नित्य सत्संग करना एवं उत्तम ग्रंथों अर्थात् सत्साक्षों का नित्य स्वाध्याय करना आवश्यक है, क्योंकि उनसे हृदय में उत्तम भावनाओं का उदय होता है और मन में दूषित विचार आने कम हो जाते हैं।
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साधक को बाह्य संसर्ग यानि कुसंग (भोगी पुरुषों का संग, सिनेमा, खेल-तमासे, गंदे दृश्य आदि) से बहुत बचना चाहिए । मोबाइल (स्मार्टफोन) या इन्टरनेट के माध्यम से गंदे कामोत्तेजक भोग-सम्बन्धी दृश्य कभी नहीं देखने चाहिए ।
सार बात यह है कि साधक का खान-पान, पठन-पाठन, संग, चेष्टाएँ आदि सब कुछ सात्त्विक होना चाहिए, तभी अन्तःकरण में सत्त्वगुण की वृद्धि होगी, मन निर्मल होगा और ब्रह्मचर्य धारण करने की योग्यता प्राप्त होगी । यदि अन्तःकरण में रजोगुण-तमोगुण छाया रहेगा तो रोज ब्रह्मचर्य नष्ट होगा और साधक ब्रह्मचर्य संयम कदापि नहीं कर पायेगा । श्रीमद्भागवत में लिखा है –
आगमोऽपः प्रजा देशः कालः कर्म च जन्म च ।
ध्यानं मंत्रोऽथ संस्कारो दशैते गुणहेतवः ॥ (भा. ११/१३/४)
'शास्त्र, जल (खान-पान), प्रजा (संग), स्थान, समय, कर्म, जन्म, ध्यान, मंत्र और संस्कार – ये दस चीजें गुण परिवर्तन का हेतु हैं; ये यदि सात्त्विक हैं तो सत्त्वगुण की, राजस हैं तो रजोगुण की और यदि तामस हैं तो तमोगुण की अन्तःकरण में वृद्धि होती है ।
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पवित्र मन के द्वारा ही ब्रह्मचर्य सम्भव
एक मात्र विशुद्ध मन ही मनुष्य को ब्रह्मचारी एवं वीर्य धारण करने के लिए समर्थ बना सकता है और मन को शुद्ध करने के लिए सुयोग्य वैद्य हैं महात्माजन । बिना सत्पुरुषों की संगति के मन-बुद्धि पूर्ण रूप से शुद्ध नहीं हो सकते हैं, इनकी शुद्धि तब मानी जाती है जब इनमें पूर्ण विवेक का प्रादुर्भाव हो जाय और विवेक की प्राप्ति एकमात्र सत्संग से ही होती है 'बिनु सत्संग बिबेक न होई ।' । अतः साधक को नित्य सत्संग करना चाहिए और सत्संग से प्राप्त विवेक के द्वारा शुद्ध हुआ मन वीर्यरक्षा के लिए दिव्यौषधि है । बाकी अन्य जितने ब्रह्मचर्य-संयम के उपाय हैं, वे अब आनुषंगिक हैं ।
इसलिए जो भी साधक (गृहस्थ या विरक्त) ब्रह्मचर्य धारण करना चाहता है तो उसे मन की शुद्धि पर बहुत ध्यान देना चाहिए, यदि मन अपवित्र है, कुसंस्कारों से युक्त है तो साधक ब्रह्मचारी रह ही नहीं सकता है । अतः ब्रह्मचर्य में सर्वाधिक आवश्यक है अध्यात्मिक ज्ञान के द्वारा चित्त का परिवर्तन करना । हम बाहर से खान-पान आदि सब कुछ ठीक कर लें लेकिन चिन्तन यदि विषयों का बना हुआ है तो बहुत प्रयास करने पर भी हम ब्रह्मचर्य धारण करने में समर्थ नहीं हो पायेंगे, हम हार जायेंगे; ऐसा सैकड़ों प्रयासरत् साधकों का अनुभव है कि प्रयास करने पर भी हम सफल नहीं हो पाते हैं; हरि-गुरु आदि की सौगन्ध खाने पर भी हम सफल नहीं होते, तो इसका प्रधान कारण असत्-चिन्तन ही है ।
चिन्तन में हमारे यह बात दृढ़ता से बैठ गयी है कि इन्द्रियजल्प भोगों में बड़ा सुख है, यही जीवन का परम आनंद है । अब हम कुछ
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दिन तक तो किसी पूजनीय की सौगन्ध आदि खाकर के भले ही ब्रह्मचर्य को रोक सकते हैं लेकिन उससे ज्यादा वह नहीं रोका जा सकता है; क्योंकि विषयों के प्रति चित्त की महत्त्वबुद्धि बनी हुयी है । भगवान् ने गीता जी में भी यही बात कही है –
विषया विनिवर्तन्ते निराहारस्य देहिनः ।
रसवर्ज रसोऽप्यस्य परं दृष्ट्वा निवर्तते ॥
यततो ह्यपि कौन्तेय पुरुषस्य विपश्चितः ।
इन्द्रियाणि प्रमाथीनि हरन्ति प्रसभं मनः ॥ (२/५९,६०)
‘निराहार रहने वाले अर्थात् इन्द्रियों द्वारा विषयों को ग्रहण न करने वाले पुरुष के विषय तो निवृत्त हो जाते हैं, परन्तु उनमें रहने वाली आसक्ति निवृत्त नहीं होती है और आसक्ति का नाश न होने के कारण ये प्रमथन स्वभाव वाली इन्द्रियाँ साधन परायण विद्वान् पुरुष के मन को भी बलात् हर लेती हैं अर्थात् उसे विषयों में गिरा देती हैं ।’ श्रीध्रुवदास जी महाराज ने भी कहा है –
रस बल छुटै न जौ विषय, सुख नहीं पावै कोइ ।
तन छोंड़े मन गहि रहै, दूनों दुख तहाँ होइ ॥
यदि चित्त से विषयासक्ति नष्ट नहीं हुई तो बाहर से विषय-सेवन त्याग देने पर भी साधक सुखी नहीं हो सकता ।
इसलिए आवश्यकता है हमें सत्संग के द्वारा चित्त में स्थित विषयासक्ति को नष्ट करने की अर्थात् चित्त का परिवर्तन करने की । भले ही हमारा भोजन सात्विक है, हम आसन-व्यायाम-प्राणायाम भी नियम से करते हैं किन्तु हमारा चिन्तन ठीक नहीं है तो हम विषय-संयोग होने पर उससे बच नहीं सकते हैं । हमारे मस्तिष्क में जो यह बात बैठी हुई है कि ‘स्त्री-शरीर में सुख है या स्त्री शरीरधारी साधिका
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सोचती है कि पुरुष शरीर में सुख है' – जब तक यह बात हमारी बुद्धि से नहीं निकलेगी तब तक हम बलात् इन्द्रियों एवं मन को कब तक रोक सकते हैं । मन से कितने समय तक लड़ सकते हैं, आखिरकार हमें परास्त होना ही पड़ेगा । वही बात आज सबके साथ हो रही है । अगर यह बात हम बुद्धि में बैठे लें कि विषय तो विष से भी ज्यादा विषैले, दुःखदायी, भय एवं अशांतिदायक हैं, तब विषयों से स्वाभाविक अरुचि होना संभव है । श्रीबिहारिन्देव जी महाराज कहते हैं –
सूकौ हाड़ हरखि गहै बिमुख विषै घर बात ।
लोहू अपने गाल को चाटि स्वानि इतरात ॥
‘जैसे कुत्ता सूखी हड्डी को चबाता है तो उसकी रगड़ से उसके अपने मसूड़े में से जो खून निकलता है, वह उसको चाटकर प्रसन्न होता है, इतराता है कि मुझे इस हड्डी में से रक्त पीने को मिल रहा है, ऐसे ही विषय सुख है, भोग में स्व जीवनी शक्ति का नाश करके भोगी पुरुष सोचता है कि स्त्री शरीर में सुख है, या स्त्री सोचती है कि पुरुष शरीर में सुख है ।’
श्रीबिहारी दास सुख विषय को ज्यों नख नैंक खुजाइ ।
बिस ब्यौरि सब अंग में पाछे पके पिराइ ॥
भगवान् श्रीकृष्णचन्द्र जू स्वयं गीता जी में कह रहे हैं –
ये हि संस्पर्शजा भोगा दुःखयोनय एव ते ।
आद्यन्तवन्तः कौन्तेय न तेषु रमते बुधः ॥ (गी. ५/२२)
‘जितने इन्द्रिय तथा विषयों के संयोग से उत्पन्न होने वाले भोग हैं, यद्यपि विषयी पुरुषों को वे सुखरूप भासते हैं, किन्तु वे सब दुःखदायी और आदि-अन्तवाले अर्थात् अनित्य हैं । इसलिए हे अर्जुन! बुद्धिमान विवेकी पुरुष उनमें रमण नहीं करते ।’
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विषयेन्द्रियसंयोगाद्यतदग्नेऽमृतोपमम् ।
परिणामे विषमिव तत्सुखं राजसं स्मृतम् ॥ (गी. १८/३८)
‘जो सुख विषय और इन्द्रियों के संयोग से प्राप्त होता है, वह पहले भोगकाल में अमृत के तुल्य प्रतीत होता है, पर परिणाम में वह विष के तुल्य है।’
अतः शास्त्रों के आधार पर अथवा सन्तों के अनुभव के आधार पर यह सुनिश्चित है कि विषयों में लेशमात्र भी सुख नहीं है, सुख तो एकमात्र सुखसिन्धु प्रभु में ही है ।
‘जो आनंद सिंधु सुखरासी । सीकर तं त्रैलोक सुपासी ॥’
‘एतस्यैवानन्दस्य अन्यानि भूतानि मात्रामुपजीवन्ति ॥’
अगर ऐसी दृढ़ धारणा बन जाए तो काम का जड़मूल से नाश हो सकता है अन्यथा असंभव है क्योंकि हमारा मन ये मान बैठा है कि विषयों में सुख है, इसलिए हम बार-बार विषयों से पराजित हो जाते हैं । अगर ये बात अभी मन में बैठ जाए कि आनंदसिन्धु तो प्रभु हैं, उन्हीं में सुख है तो सारे विषय स्वतः ही सारहीन और विषवत् प्रतीत होने लगेंगे । गोस्वामी श्रीतुलसीदासजी कह रहे हैं –
जो मोहि राम लागते मीठे ।
तो नवरस षट्तरस रस अनरस, है जाते सब सीठे ॥
श्रीनारायणस्वामी जी के भी वचन हैं –
ब्रह्मादिक के भोग सुख विष सम लागत ताहि ।
नारायन ब्रज-चन्द्र की लगन लगी है जाहि ॥
श्रीपादप्रबोधानंदसरस्वती जी कह रहे हैं कि यदि श्रीकिशोरीजी के चरणों में उपासक का मन लग जाय तो भगवान् के मोहनी अवतार में भी सामर्थ्य नहीं, जो ऐसे उपासक के मन में क्षोभ पैदा कर सके ।
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जैसे नामाचार्य श्रीहरिदास ठाकुर जी की नवीन तरुण अवस्था है, वलिष्ठ शरीर है, एकांत में बैठकर भजन में निमग्न हैं, उनसे द्वेष करने वाले रामचंद्र खों ने उन्हें भ्रष्ट करने के लिए आदृत श्रृंगार से सुसज्जित नवयुवती वेश्या को उनके पास भेजा । वह ३ रात्रि लगातार एकांत में उनके पास आई लेकिन उनका मन एक बार भी चलायमान नहीं हुआ अर्थात् उसकी ओर आकर्षित नहीं हुआ अपितु महामंत्र के श्रवण से एवं उन महापुरुष के दर्शन के प्रभाव से उस वेश्या का ही चित्त परिवर्तित हो गया और वह वेश्यावृत्ति त्यागकर प्रभु की महान भक्ता बन गयी ।
इसलिए प्रभु की भक्ति में कितना बल है, संसारी लोग जिन विषय-सुखों की प्राप्ति के लिए अनेकानेक प्रयत्न करते हैं किन्तु प्रभु का प्रेमी भक्त उन्हीं विषय-सुखों को विषवत्, वमनवत् अथवा मलवत् छोड़ देता है । गोस्वामी तुलसीदास जी मानस जी में प्रेममूर्ति श्रीभरतलालजी के बारे में लिखते हैं -
भूषन बसन भोग सुख भूरी । मन तन वचन तजे तिन तूरी ॥ अवध राजु सुर राजु सिहाई । दसरथ धनु सुनि धनदु लजाई ॥ तेहिं पुर बसत भरत बिनु रागा । चंचरीक जिमि चंपक बागा ॥ रमा बिलासु राम अनुरागी । तजत बमन जिमि जन बड़भागी ॥
‘श्रीभरतजी ने गहने-कपड़े और अनेकों प्रकार के भोग-सुखों को मन, तन और वचन से तृण तोड़कर यानी प्रतिज्ञा करके त्याग दिया । जिस अयोध्या के राज्य को देवराज इन्द्र सिहाते हैं और जिन दशरथजी की सम्पत्ति को सुनकर कुबेर भी लजा जाते हैं; उसी अयोध्यापुरी में भरतजी अनासक्त होकर इस प्रकार निवास कर रहे हैं, जैसे चम्पा के बाग में भौरा रहता है ।
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अतः गोस्वामी तुलसीदास जी कहते हैं कि श्रीरामचन्द्रजी के प्रेमी बड़भागी पुरुष लक्ष्मी के विलास (भोगैश्वर्य) को वमन की भाँति त्याग देते हैं।'
इसी तरह से श्रीमद्भागवत में भी ऋषभनन्दन श्रीभरतजी के विषय में लिखा है -
यो दुस्त्यजान्दारसुतान् सुहृद्राज्यं हृदिस्पृशः ।
जहौ युवैव मलवदुत्तमश्लोकलालसः ॥ (भा. ५/१४/४३)
'उन्होंने पुण्यकीर्ति भगवान् श्रीकृष्ण को प्राप्त करने की इच्छा से अत्यन्त मनोरम तथा दुस्त्यज (कठिनाई से त्यागने योग्य) स्त्री-पुत्रादि, मित्र और राज्य को युवावस्था में ही विष्ठा के समान त्याग दिया।'
सारे विषय-सुख श्रीरघुनाथदास जी के घर में थे। घरवालों ने देखा कि ये तो प्रभु की भक्ति की तरफ आकर्षित हो रहा है तो उन्होंने उनका विवाह एक अत्यन्त सुन्दर नवयुवती कन्या से करवा दिया, लेकिन रघुनाथदास जी ने उस कन्या की तरफ देखा भी नहीं; क्योंकि उनका चित्त श्यामसुन्दर की तरफ मचल पड़ा था। सारे भोग उनको बड़े कष्टदायी लगते थे और एक दिन वे उन सब भोगों को छोड़कर घर से भजन के लिए भाग निकले।
अब विचार करो, जिन भोगों की प्राप्ति के लिए लोग जाने क्या-क्या नहीं करते हैं, भक्त को सहज में प्राप्त होने पर भी वह उन्हें स्वीकार नहीं करता है।
इसलिए व्यायाम-प्राणायाम और सात्त्विक आहार ब्रह्मचर्य धारण करने में सहायक जरूर है लेकिन मुख्य बात है चिन्तन बदलना; बाकी ये सब गौड़ बातें हैं। यदि हमारा चिन्तन विषयों का बना रहा तो हम ब्रह्मचर्य को रोक पाने में समर्थ नहीं हो सकते हैं, अतः चिन्तन
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बदलना बहुत जरूरी है और उसके बदलने के लिए नित्य सत्संग, शास्त्र स्वाध्याय और नामजप तीनों अति आवश्यक हैं । इससे चिंतन बदलेगा और व्यायाम-प्राणायाम आदि से शरीर की नस-नाड़ियाँ मजबूत होंगी । शुद्ध आहार से मन चलायमान नहीं होगा । आप तीनों को करें, आहार ठीक कीजिये, भजन-साधन से चिंतन ठीक कीजिये और हृद निश्चय के द्वारा उन अशुभ क्रियाओं को दूर कीजिये, जो अशुभ क्रियाएँ आप कर रहे हैं तो आप सुधर जायेंगे नहीं तो कुछ दिनों बाद ऐसा होने लगेगा कि आपकी विचार शक्ति लुप्त हो जायेगी । आपके अन्दर बिना किसी कारण के भय और घबराहट बनी रहेगी यानी सैकड़ों तरह की परेशानियाँ आ जायेंगी ।
जब तक चिंतन अपवित्र है तब तक ब्रह्मचर्य धारण करना बड़ा कठिन है । ब्रह्मचर्य संयम के लिए आवश्यक मुख्य बात है कि हमारा चिंतन बदले ।
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ब्रह्मचर्य सम्बन्धी साधकों की कुछ जिज्ञासाएँ
प्रश्न - मेरा मन विषय-भोगों की ओर जाता है तो मैं क्या करूँ ?
समाधान - मन तो विषयों की ओर जाएगा ही क्योंकि जब तक पूर्ण रूप से अन्तःकरण पवित्र नहीं होता है, तब तक मन भोगों की तरफ जाता ही है, इसलिए इसमें विचलित होने की बात नहीं है । जब आपका मन विषयों के प्रति जाए तो उस समय आपको सावधानी यह रखनी है कि उसके कथनानुसार अर्थात् मन की प्रेरणा के अनुसार आपको कोई असत् चेष्टा नहीं करनी है क्योंकि मन चाहे जितनी उड़ान भरे किन्तु बिना तन (शरीर) के यह कर कुछ नहीं सकता । इसलिए मन जब कामादि दोषों से युक्त हो तो उस समय गंदी-क्रिया करने से बचना है तथा एकांत सेवन भी उस समय नहीं करना चाहिए । अच्छे लोगों के समूह में रहना चाहिए क्योंकि एकांत में मन हावी हो सकता है अर्थात् असत् चेष्टा करा सकता है । पूर्वकृत कर्मों का मन स्मरण कराता है और उस सुख की तृष्णा प्रकट करके विषयों को भोगने के लिए विवश करता है । साधक को चाहिए उस समय उदासीन होकर के उच्चस्वर से नाम-संकीर्तन करे, यदि यह भी संभव न हो तो इतना देखता रहे कि मन के अनुसार क्रिया न होने पाए । वह चिंतन थोड़ी देर के लिए आया है, यह बराबर स्थिति नहीं रहती है । जैसे भजन की कभी-कभी ऐसी रसमयी स्थिति आती है कि लगता है काम बन गया लेकिन वह बराबर नहीं रहती है । वह फिर हट जाती है । ऐसे ही जब मन गंदा भाव प्रकट करके विचलित करता है तो उस समय सबसे पहले साधक को धैर्य रखना चाहिए कि ये वृत्ति स्थायी नहीं है, थोड़ी देर के लिए आई है और कुछ समय पश्चात् स्वतः चली जायेगी ।
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उस समय घबड़ाने की जरूरत नहीं है। एकदम तन्मय होने की जरूरत नहीं है कि हाय ! हमारा मन अब ऐसे दोषों से युक्त हो गया है। अब हमारा क्या होगा ? कुछ नहीं, कभी गरम हवा चलती है तो कभी ठण्डी। ऐसे ही कामादि दोष मन में संस्कारवश, संगवश या स्वभाववश आ जाते हैं। कहीं न कहीं कोई त्रुटि या प्रमाद होता है, तभी ऐसी वृत्ति आती है लेकिन आ गयी तो चली भी जाएगी, उसके प्रति बहुत महत्त्व बुद्धि न रखें। अगर उसके प्रति तन्मयता करोगे तो क्लेश का अनुभव होगा।
(इसलिए इतनी सावधानी जरूरी है कि न उसके अनुसार कोई क्रिया हो, न ही उसको महत्त्व देना है और भयभीत होने की भी इसलिए जरूरत नहीं क्योंकि मन में इतनी सामर्थ्य नहीं कि वह क्रिया के बिना हमें नष्ट कर दे।) क्रिया न होने पाए इसके लिए साधकों के बीच में रहे। अगर क्रिया न बनी तो मन धीरे-धीरे अमना होने लगता है। जिस भाव के लिए मन प्रेरित करे, उसको वह भाव न मिले तो धीरे-धीरे मन का मनपन नष्ट होने लगता है। भोगों का संकल्प करना ही मन का जीवित रहना है और भोगों से निःसंकल्पित हो जाना ही मन का मर जाना है।
जब साधक के मन में भोगों का संकल्प बने तो वह उसको पूरा न होने दे, थोड़ी जलन तो उसको सहनी पड़ेगी; इस वेग को सहना ही वास्तविक तपस्या है। जल पीकर रहना, वायु पीकर रहना, अग्नि में तपना, ये सब बाह्य साधन हैं, इनका कोई विशेष महत्त्व नहीं है। वास्तविक तपस्या तो यह है कि जब हमारा मन प्रतिकूल भाव का चिंतन करके जलाता है, उसको साधक सहे। उस समय साधक को विचलित नहीं होना चाहिए बल्कि प्रभु के चिंतन में मग्न होकर धैर्य पूर्वक उस जलन को सह जाना चाहिए; जो सह जाता है, वही महात्मा
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है और वही इस महारस का अनुभव कर सकता है । बिल्कुल विचलित होने की जरूरत नहीं है, सबके हृदय में ऐसे भाव आते हैं (श्रीनारदजी ने भक्तिसूत्र में लिखा है कि जो तरंग की तरह गंदे भाव हृदय में उदय हो रहे हैं, साधक उनका चिंतन करके वैसी क्रिया न करे तो वह जो तरंग उठ रही है, वह नष्ट हो जायेगी और यदि आपने कहीं उसके अनुसार क्रिया कर ली तो वही तरंग समुद्र बन जायेगी फिर पार होना बड़ा कठिन है, समुद्र बन गयी तो डूबना ही पड़ेगा ।)
इसलिए साधक के मन में जहाँ कामादि दोषों की वृत्ति आये तो वह घबड़ाये नहीं, क्योंकि जब शत्रु सामने से आक्रमण कर रहा हो तो जो घबड़ा गया, वह योद्धा किस बात का ? अतः सबसे पहली बात साधक के हृदय में भय नहीं होना चाहिए । काम आया ठीक है, चला जाएगा । उसके प्रति महत्त्व बुद्धि नहीं देना है, कुछ समय पश्चात् वह भाव नष्ट हो जाएगा यानी चला जाएगा, वह हृदय में रुकने वाला भाव नहीं है क्योंकि सब आगन्तुक भाव हैं – ‘आगमापायिनोऽनित्याः’ कितना भी बड़ा वेग आए कुछ समय धैर्य पूर्वक अपने को बचाकर के रखो, वह निकल जाएगा । यदि आपने उसके अनुसार क्रिया नहीं होने दी तो धीरे-धीरे ऐसी स्थिति आ जायेगी कि उत्तरोत्तर क्षीण होते-होते, ये भाव आना ही बंद हो जायेंगे ।
साधक को सैकड़ों बार गिरने पर भी निरुत्साहित नहीं होना है । प्रायः अधिकांश साधक उत्साहहीन हो जाते हैं और आत्महत्या जैसा जघन्य पाप करने की सोचने लगते हैं जबकि यह बिल्कुल गलत है क्योंकि घबड़ाने की जरूरत नहीं है, विषयों से बार-बार परास्त होने के बाद भी फिर से इस संकल्प को लेकर उठो कि अबकी बार तो इन विषयों को परास्त करके ही रहूँगा और देखना एक दिन ऐसा आयेगा
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कि तुम निश्चित इन पर विजय प्राप्त कर लोगे क्योंकि भगवान् के तुम अंश हो ।
प्र०-बिना क्रिया के वीर्य स्वलित हो जाता है तो क्या करें ?
समाधान – अशुद्ध भोजन, कुसंग, गलत चिंतन, गलत आचरण आदि के कारण साधक अपने ब्रह्मचर्य को नहीं सँभाल पाता है । कई ऐसे कारण होते हैं, जिनसे साधक स्वप्रदोष से युक्त हो जाता है । जिस साधक ने पहले कभी किसी भी तरह से धातु को नष्ट किया है तो वीर्य का स्वभाव बन जाता है स्वलित होने का । अब जननेन्द्रिय का अभ्यास बन गया धातु क्षीण करने का, इसलिए अब वह चेष्टा न भी करे तो भी धातु अपने आप क्षीण हो जायेगी क्योंकि अभ्यास बन गया है । स्वतः वीर्य स्वलन का । एक कारण अनुचित आहार भी है; जब कोई ब्रह्मचर्य में निषिद्ध आहार का सेवन कर लेता है तो उससे भी धातु का क्षरण हो जाता है अथवा गलत चिंतन भी धातु क्षरण में एक हेतु है । जैसे स्वप्न में गलत चिंतन हुआ तो स्वप्रदोष हो जाता है ।
यदि साधक स्वप्रदोष से बचना चाहता है तो प्रभु की शरणागति से युक्त होकर के वह निरन्तर नामजप करे, सत्यास्त्रों का स्वाध्याय करे, सात्त्विक भोजन पाये और खूब शरीर से श्रम करे यानी शरीर को थकाए । शरीर को थकाना बहुत जरूरी है । यदि साधक नित्य प्रातःकाल उठकर के कम से कम १ घंटा व्यायाम करे तो उसको अनुभव होगा कि हमारा धातु क्षरण होना कम हुआ है, वीर्यपात में अन्तराय होता चला जाएगा ।
यदि कोई स्वयं दिन में कई बार हस्त-मैथुन के द्वारा वीर्य क्षरण करे और फिर इसके उपाय ढूँढ़े तो फिर क्या उपाय रह गया ? इसलिए पहले इस गंदी क्रिया को रोकें फिर आयुर्वेदिक किसी वैद्य से धातु
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