भारतकोश
ब्रह्मचर्य - स्वस्थ व सुखमय साधना

ब्रह्मचर्य - स्वस्थ व सुखमय साधना

Brahmacharya - Swasth Va Sukhmay Sadhana

प्रेमवल्लभा शरण द्वारा

स्रोत: 2019 Shri Hit Radha Keli Kunj Trust edition · श्री हित राधा केलि कुञ्ज ट्रस्ट, वृन्दावन · 2019 (उद्गम)

DevanagariHindipublished74 पृष्ठ

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साधक भोगी प्राणियों का संग त्याग दे । सब प्रकार से इन्द्रियों को अन्तर्मुख कर ले । अकेला ही रहता हुआ एकान्त में मन को प्रभु में लगा दे । यदि संग करे तो भगवत्प्रेमी महात्माओं का करे ।'

इसलिए (मन पर कभी विश्वास नहीं करना कि हम बड़े ऊँचे संयमी साधक हैं, हमारे ऊपर किसी दृश्य का कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा। सावधान ! अगर इस तरह से मन की बात मानकर असावधानी पूर्वक हमने व्यवहार किया तो पतन होने से कोई बचा नहीं सकता है।)

इसलिए विपरीत शरीरधारी साधक से बात भी करो तो नजर झुकाकर के । इस तरह से इस आकर्षण से बचा जा सकता है, अगर नेत्र से नेत्र मिलाकर के देखोगे तो तुम्हारे चित्त का हरण हो जाएगा -

दर्शनात् हरते चित्तं, स्पर्शात् हरते बलम् ।

भोगात् हरते वीर्यं, स्त्री प्रत्यक्षा राक्षसी ॥

अर्थात् स्त्री शरीर को देखने मात्र से चित्त का हरण होता है (मन उन पर मोहित हो जाता है), उसके स्पर्श से बल का हरण होता है और उसके साथ समागम करने से वीर्य का हरण होता है, अतएव पराई स्त्री पुरुष के लिए और पर-पुरुष स्त्री के लिए साक्षात् विपत्ति के समान है; इसलिए महापुरुषों ने कहा है -

अरे नर परनारी मत ताक रे ।

जिन जिन ओर डायन के तिन तिन को गयी भाख रे ॥

दृष्ट्वा स्त्रियं देवमायां तद्भावैः अजितेन्द्रियः ।

प्रलोभितः पतत्यन्धे तमस्यग्नौ पतङ्गवत् ॥ (श्रीमद्भगवद्गीता ११/८/७)

'जैसे रूपासक्त पतंग अग्नि में जा गिरता है । वैसे ही अजितेन्द्रिय पुरुष भी देवमाया स्त्री को देखकर उसके हाव-भावों से मोहित होकर घोर अन्धकार में गिर जाता है ।' यही बात स्त्री साधकों को पुरुष वर्ग के लिए ध्यान रखनी है ।'

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