भारतकोश
ब्रह्मचर्य - स्वस्थ व सुखमय साधना

ब्रह्मचर्य - स्वस्थ व सुखमय साधना

Brahmacharya - Swasth Va Sukhmay Sadhana

प्रेमवल्लभा शरण द्वारा

स्रोत: 2019 Shri Hit Radha Keli Kunj Trust edition · श्री हित राधा केलि कुञ्ज ट्रस्ट, वृन्दावन · 2019 (उद्गम)

DevanagariHindipublished74 पृष्ठ

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(१) स्मरण – किसी चित्र या दृश्य में देखे हुए स्त्री के रूप का काम-भाव से चिंतन करना अथवा किसी आस-पड़ौस की रूपवती स्त्री को देखकर लंपट होकर निरन्तर उसका स्मरण करना; इससे ब्रह्मचर्य नष्ट हो जाता है। इसलिए यदि बुरे विचार कभी मन में उदित हों तो उन्हें तत्काल दूर कर देना चाहिए, कदापि मन में जमने नहीं देना चाहिए। वेदों में लिखा है 'तन्मे मनः शिव संकल्पमस्तु' मेरा मन शुद्ध विचारों वाला हो।

श्रीनारदजी महाराज ने भी भक्तिसूत्र में कहा है कि 'स्त्री, धन, बैरी तथा नास्तिक का चरित्र श्रवण नहीं करना चाहिए।' क्योंकि हम जिसकी चर्चा करते हैं तो हमारा चित्त उसी का चिंतन करने लगता है। जैसे किसी स्त्री के रूप और स्वभाव आदि की चर्चा सुनी तो मन उसी का चिंतन करने लगेगा और 'यस्य मनः स्त्रियाश्चिन्तने संलग्नं स भगवच्चिन्तनं कथमपि न कर्तुं शक्नोति।' जिसका मन स्त्री के चिंतन में संलग्न है, उसकी सामर्थ्य नहीं है कि वह भगवच्चिन्तन कर सके। जब हम स्त्री-सम्बन्धी चर्चा (स्त्री के रूप के विषय में वार्ता या स्त्री सुख की चर्चा) करते हैं तो हमारा चित्त उसका चिन्तन करने लगता है क्योंकि चित्त एक शुभ्र (श्वेत) वस्त्र की भाँति है, जो कुछ हम देखते हैं, सुनते हैं या चिंतन करते हैं वैसा ही रंग उस पर चढ़ जाता है, यदि हम आँखों से स्त्री के रूप को देखेंगे, कान से स्त्री-सुख-सम्बन्धी वार्ता सुनेंगे तो वही चिंतन चलने लगेगा और निश्चित हम भ्रष्ट हो जायेंगे।

श्रीकपिल भगवान् ने कहा है –

न तथास्य भवेन्मोहो बन्धश्चान्यप्रसङ्गतः ।

योपित्सङ्गाद्यथा पुंसो यथा तत्सङ्गिसङ्गतः ॥ (श्रीमद्भा० ३/३१/३५)

'इस पुरुष को किसी और के साथ से वैसा अज्ञान और बंधन नहीं हो सकता है, जैसा स्त्रियों के संग से अथवा स्त्रियों के चक्र में

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