भारतकोश
ब्रह्मचर्य - स्वस्थ व सुखमय साधना

ब्रह्मचर्य - स्वस्थ व सुखमय साधना

Brahmacharya - Swasth Va Sukhmay Sadhana

प्रेमवल्लभा शरण द्वारा

स्रोत: 2019 Shri Hit Radha Keli Kunj Trust edition · श्री हित राधा केलि कुञ्ज ट्रस्ट, वृन्दावन · 2019 (उद्गम)

DevanagariHindipublished74 पृष्ठ

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अष्टांग मैथुन का त्यागी ही सच्चा ब्रह्मचारी

योगदर्शन के भाष्य में भाष्यकार श्रीवेदव्यासजी ब्रह्मचर्य की परिभाषा लिखते हैं - 'ब्रह्मचर्य गुप्तेन्द्रियस्योपस्थस्य संयमः ।' अर्थात् गुप्त (उपस्थ) इन्द्रिय के संयम को ब्रह्मचर्य कहते हैं । अन्यत्र ब्रह्मचर्य की और सूक्ष्म व्याख्या भी मिलती है -

'ब्रह्मचर्य नाम सर्वावस्थासु मनोवाक्कायकर्मभिः सर्वत्र मैथुनत्यागः ।'

कायेन मनसा वाचा सर्वावस्थासु सर्वदा ।

सर्वत्र मैथुन-त्यागो, ब्रह्मचर्य प्रचक्षते ॥

शरीर, मन और वचन से सभी अवस्थाओं में, सर्वदा और सर्वत्र मैथुन (सम्भोग) के त्याग को ब्रह्मचर्य कहा जाता है ।

कायिक ब्रह्मचर्य - आलिंगन, चुम्बन, अंगमर्दन तथा उपस्थेन्द्रिय के सञ्चालन से रहित होना ।

मानसिक ब्रह्मचर्य - विषय-चिंतन, सम्भोग के मनोरथ आदि को भलीभाँति त्याग देना ।

वाचिक ब्रह्मचर्य - प्राकृत प्रेमालाप, विषय सम्बन्धी चर्चा, गुह्य भाषण आदि से रहित होना ।

स्मरणं कीर्तनं केलिः प्रेक्षणं गुह्यभाषणम् ।

संकल्पोऽध्यवसायश्च क्रियानिष्पत्तिरेव च ॥

एतन्मैथुनमष्टांगं प्रवदन्ति मनीषिणः ।

विपरीतं ब्रह्मचर्यमनुष्ठेयं मुमुक्षुभिः ॥ (दक्ष संहिता)

स्मरण, कीर्तन, केलि, प्रेक्षण, गुप्तभाषण, संकल्प, अध्यवसाय और क्रिया-निष्पत्ति - ये मैथुन के आठ अंग मनीषियों ने बताया हैं, इसके विपरीत इन सबका त्याग ही पूर्ण ब्रह्मचर्य माना जाता है ।

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