ब्रह्मचर्य - स्वस्थ व सुखमय साधना
Brahmacharya - Swasth Va Sukhmay Sadhana
प्रेमवल्लभा शरण द्वारा
स्रोत: 2019 Shri Hit Radha Keli Kunj Trust edition · श्री हित राधा केलि कुञ्ज ट्रस्ट, वृन्दावन · 2019 (उद्गम)
पृष्ठ 37, कुल 74 में से
संदर्भ में पढ़ें‘जीव स्वयं कर्म करता है और स्वयं उसका शुभाशुभ फल भोगता है। वह अपने ही कर्म से संसार में चक्कर लगाता है और अपने ही कर्मों से इन सबसे मुक्त भी होता है।’
इसीलिये श्रीकृष्णचन्द्रजू महाराज ने गीता जी में कहा –
उद्धरेदात्मनाऽत्मानं नाल्मानमवसादयेत् ।
आत्मेव ह्यात्मनो बन्धुरात्मेव रिपुरात्मनः ॥ (गी. ६/५)
‘अपने द्वारा अपना संसार-समुद्र से उद्धार करें और अपने को अधोगति में न डालें क्योंकि यह मनुष्य आप ही तो अपना मित्र है और आप ही अपना शत्रु है।’
इसीलिये सावधान - भूलि न देहि कुमारग पाऊ।
यदि कोई पुरुष काम से पीड़ित होकर के अगम्यागमन करता है अथवा स्त्री कामातुर होकर के पर पुरुष से समागम करती है तो उन्हें तप्तसूर्या नामक नरक में जाना पड़ता है। वहाँ तपाये हुए लोहे की स्त्री मूर्ति से पुरुष को एवं तपाये लोहे के पुरुष से स्त्री को बहुत काल तक आलिंगन कराया (चिपकाया) जाता है। ये दण्ड मिलता है -
सूर्या लोहमय्या पुरुषं आलिंगयन्ति स्त्रियं च पुरुष रूप्या सूर्या ।
(श्रीमद्भा० ५/२६/२०)
श्रीरामचरितमानस में अनुसूया जी ने भी कहा है -
पति वंचक परपति रति करई । रौरव नरक कल्प सत परई ॥
छन सुख लागि जनम सत कोटि । दुख न समुझ तेहि सम को खोटी ॥
पति प्रतिकूल जनम जहाँ जाई । विधवा होइ पाइ तरनाई ॥ (३/५)
जो स्त्री अपने पति को छोड़कर किसी पर पुरुष को कामुकता की दृष्टि से देखती हैं, उससे संपर्क करती है तो उसे सौ कल्पतक रौरव नरक में पड़ा रहना पड़ता है। क्षणभर के सुख के लिए जो सौ करोड़ (असंख्य) जन्मों के दुःख को नहीं समझती, उसके समान दुष्टा कौन
31
Scanned with CamScanner