भारतकोश
ब्रह्मचर्य - स्वस्थ व सुखमय साधना

ब्रह्मचर्य - स्वस्थ व सुखमय साधना

Brahmacharya - Swasth Va Sukhmay Sadhana

प्रेमवल्लभा शरण द्वारा

स्रोत: 2019 Shri Hit Radha Keli Kunj Trust edition · श्री हित राधा केलि कुञ्ज ट्रस्ट, वृन्दावन · 2019 (उद्गम)

DevanagariHindipublished74 पृष्ठ

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के साथ एकांत में संभाषण करने से बचना चाहिए; लोकसंग्रह की दृष्टि से भी । यदि अति आवश्यक हो यानी बात करनी ही पड़े तो खुले में करो, जहाँ सब लोग आपको देख रहे हों । यदि आप एकांत में ऐसा कर रहे हैं तो आप ब्रह्मचर्य से नहीं रह सकते हो, ऐसा शास्त्र का कथन है ।

(६) संकल्प – किसी स्त्री को देखकर मैथुन का संकल्प करना ।

(७) अध्यवसाय – उस संकल्प को पूरा करने के लिए उपाय करना । अर्थात् शील-लज्जा आदि को छोड़कर उचित-अनुचित का विचार न करते हुए गंदे कृत्य करने के लिए निश्चय करना ।

(८) क्रिया-निष्पत्ति – क्रिया पूरी करना अर्थात् सम्भोग करके वीर्य स्वलित करना । इन ८ गलतियों से ब्रह्मचर्य क्षीण हो जाता है । ये जो ब्रह्मचर्य के नाशक अष्ट प्रकार के भाव हैं, इनसे पूर्णतया बचना चाहिए ।

जो साधक या साधिका ब्रह्मचर्य से रहना चाहें वे कभी भी कामुकता की दृष्टि से परस्पर शरीरों को न देखें और न ही कभी भी किसी भी भावना से विपरीत शरीरधारी को अपने निकट आने दें तथा न स्वयं उनके सन्निकट जायें । ऐसा भाव कभी मन में न आये कि मैं तो सिद्ध हूँ, मैं जैसा चाहूँ मनमाना आचरण कर सकता हूँ । भगवान व्यासदेव जी ने लिखा है कि बड़े-बड़े विद्वान् भी इस आकर्षण में गिर सकते हैं –

मात्रा स्वस्त्रा दुहित्रा वा न विवित्कासनो भवेत् ।

बलवानिन्द्रियग्रामो विद्वान्समपि कर्षति ॥ (भा. ९/१९/१७)

‘मनुष्य को चाहिये कि अपनी माता, बहन अथवा पुत्री के साथ भी कभी एकांत में न रहे; क्योंकि इन्द्रियाँ बड़ी प्रबल होती हैं, वे विद्वान् पुरुष को भी अपनी तरफ खींच लेती हैं ।’

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