ब्रह्मचर्य - स्वस्थ व सुखमय साधना
Brahmacharya - Swasth Va Sukhmay Sadhana
प्रेमवल्लभा शरण द्वारा
स्रोत: 2019 Shri Hit Radha Keli Kunj Trust edition · श्री हित राधा केलि कुञ्ज ट्रस्ट, वृन्दावन · 2019 (उद्गम)
पृष्ठ 28, कुल 74 में से
संदर्भ में पढ़ेंबूँद करके वीर्य गिरने लगता है । पुंस्त्व नष्ट हो जाता है । मुँह पर मुँहासे निकल आते हैं । उठते समय आँखों के सामने अँधेरा छा जाता है । बहुत जल्दी उसे भूलने की आदत हो जाती है । उसका चित्त अत्यंत चंचल व दुर्बल हो जाता है । कोई भी कार्य पूरा किये बिना ही वह छोड़ देता है । वह क्षण-क्षण में विचारों को बदलता रहता है । उसकी आँखों में जलन पैदा होती है – ये सब वीर्यनाश के लक्षण हैं । जो हस्त क्रिया के द्वारा ब्रह्मचर्य क्षीण करते हैं, वे प्रतिक्षण काम से युक्त रहते हैं और उनके अन्दर वही चिंतन चलता रहता है । वीर्य-क्षय से मन मलिन हो जाता है । बड़े-बड़े श्रेष्ठ पुरुष भी ब्रह्मचर्य से पतित होते ही संसार में श्रीहीन हो जाते हैं । वीर्य क्षय से धातु-रोग, रक्त-विकार, दृष्टि-हीनता आदि रोग उत्पन्न होते हैं । वीर्य-नाश से आनन्द, साहस, धैर्य, वीरत्व, तेज, शान्ति, ज्ञान और सद्दिचार आदि सब दैवीय सम्पदा नष्ट हो जाती है और अति मैथुन से शूल, खाँसी, ज्वर, श्वास, दुर्बलता, पीलिया रोग, क्षय आदि रोग उत्पन्न हो जाते हैं ।
शूल कास ज्वर श्वास, कर्ष्य पाद्मामयक्षयाः ।
अति व्यवयाजायन्ते रोगाश्चाक्षेपकादयः ॥
वीर्य के अधीन ही शारीरिक और मानसिक सारी शक्तियाँ रहती हैं । इसी के प्रभाव से ब्रह्मचारियों का शरीर बल-वीर्य से पूर्ण, सुन्दर, दृष्ट-पुष्ट तथा पवित्र देखा जाता है । व्यभिचारी पुरुष क्षणिक सुख के लिए अपने वीर्य का नाश कर डालते हैं, अतः उनका शरीर निस्तेज, निर्बल तथा कुरूप हो जाता है । वीर्यनाश से ही मनुष्य की मृत्यु भी शीघ्र हो जाती है ।
इसलिए इस अमूल्य रत्न को केवल गर्भाधान के अभिप्राय से ही शरीर से बाहर निकालना चाहिए अन्यथा इसकी आवश्यकता न हो तो कभी भी शरीर से पृथक नहीं करना चाहिए ।
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