ब्रह्मचर्य - स्वस्थ व सुखमय साधना
Brahmacharya - Swasth Va Sukhmay Sadhana
प्रेमवल्लभा शरण द्वारा
स्रोत: 2019 Shri Hit Radha Keli Kunj Trust edition · श्री हित राधा केलि कुञ्ज ट्रस्ट, वृन्दावन · 2019 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंशुक्र (वीर्य) के निर्माण की प्रक्रिया
रसाद् रक्तं ततो मांसं मांसान्मेदः प्रजायते ।
मेदस्यास्थिः ततो मज्जा मज्जायाः शुक्रसंभवः ॥
जब जठराग्नि अन्न को पचाती है तो अन्न का जो सारभाग रस निकलता है उस रस से रक्त, रक्त से मांस, मांस से मेद, मेद से हड्डी, हड्डी से मज्जा और मज्जा से शुक्र (वीर्य) का निर्माण होता है ।
धातौ रसदौ मज्जान्ते प्रत्येकं क्रमतो रसः ।
अहोरात्रात्स्वयं पञ्च, सार्धं दण्डञ्च तिष्ठति ॥
रस से लेकर मज्जा तक प्रत्येक धातु पाँच दिन-रात और डेढ़ घड़ी (३६ मिनिट) तक अपनी अवस्था में रहती है । तदनन्तर वीर्य बनता है अर्थात् ३० दिन-रात और ९ घड़ी (पौने चार घण्टे) में रस से वीर्य की उत्पत्ति होती है ।
करीब एक महीने में एक दिन खाए हुए अन्न का वीर्य बनता है और करीब ४० दिन के भोजन का उतना वीर्य बनता है, जितना एक बार की मैथुन क्रिया में नष्ट हो जाता है ।
शरीर में कोई ऐसा स्थान विशेष नियत नहीं है, जहाँ शुक्र (वीर्य) विशेष रूप से विद्यमान रहता हो । शुक्र सम्पूर्ण शरीर अर्थात् सर्वांग में व्याप्त रहता है; यदि वीर्य एक स्थान पर रहने वाला पदार्थ होता, तो इसके संरक्षण या नाश का अच्छा-बुरा प्रभाव सब अंगों पर न पड़ता । यथा पयसि सर्पिस्तु गूढश्चैतौ रसो यथा ।
एवं हि सकले काये शुक्रं तिष्ठति देहिनाम् ॥
‘जैसे दूध में घी और गन्ने में रस व्याप्त रहता है, उसी प्रकार देहधारियों के शरीर भर में शुक्र भी रहता है ।’
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