ब्रह्मचर्य - स्वस्थ व सुखमय साधना
Brahmacharya - Swasth Va Sukhmay Sadhana
प्रेमवल्लभा शरण द्वारा
स्रोत: 2019 Shri Hit Radha Keli Kunj Trust edition · श्री हित राधा केलि कुञ्ज ट्रस्ट, वृन्दावन · 2019 (उद्गम)
पृष्ठ 26, कुल 74 में से
संदर्भ में पढ़ेंवीर्यक्षय से होने वाली हानियाँ
आज नवयुवकों में यह रोग भीषण रूप से फैला हुआ है । एक बार जो इसके चक्र में पड़ जाता है, फिर आमरण इस संहारकारी रोग से वह मुक्त नहीं हो पाता है । यह बीमारी बड़े-बड़े विद्वानों तक में भी फैली हुई है और यह बड़ी निर्दयता से मनुष्य के शरीर को निचोड़ रही है । इससे इतनी हानियाँ होती हैं कि जिनका उल्लेख कर पाना भी संभव नहीं है ।
जिस प्रकार लकड़ी में घुन लग जाने से वह बिल्कुल खोखली हो जाती है, उसी प्रकार हस्त-क्रिया के द्वारा वीर्य के स्वचलन से लोगों की अवस्था जर्जरित हो जाती है । इससे शिश्वेन्द्रिय की सब नसें ढीली पड़ जाती हैं, इन्द्रिय-शिथिलता के कारण वीर्य बहुत जल्दी गिरने लगता है । बार-बार स्वप्रदोष होने लगता है । जरा-सी भी विषय-सम्बन्धी बात मन में उदित हुई, इतने से ही वीर्य गिरने लगता है और अन्त में कुछ दिनों बाद भरी जवानी में ही मनुष्य नपुंसक होकर बुढ़ापे का अनुभव करने लगता है ।
निरन्तर धातुक्षय होने से धातु में क्षीणता आ जाती है और दृष्टि की कमी, क्षुधा, तृषा, मन्दाग्नि, स्वप्रदोष, उन्माद, बुद्धि-भ्रंश, क्षय, मधुमेह आदि रोग उत्पन्न होते हैं ।
ऐसा मनुष्य स्त्री-समागम के भी सर्वथा अयोग्य हो जाता है । उसका वीर्य पानी की तरह बिल्कुल पतला हो जाता है । हस्त-मैथुन द्वारा वीर्य निकलने से कलेजे पर बड़े जोरों का धक्का लगता है । इस धक्के से खाँसी, श्वास, यक्ष्मा जैसे भयानक रोग उत्पन्न हो जाते हैं और मनुष्य की आयु क्षीण हो जाती है । मन अत्यंत दुर्बल हो जाता है,
20
Scanned with CamScanner