भारतकोश
ब्रह्मचर्य - स्वस्थ व सुखमय साधना

ब्रह्मचर्य - स्वस्थ व सुखमय साधना

Brahmacharya - Swasth Va Sukhmay Sadhana

प्रेमवल्लभा शरण द्वारा

स्रोत: 2019 Shri Hit Radha Keli Kunj Trust edition · श्री हित राधा केलि कुञ्ज ट्रस्ट, वृन्दावन · 2019 (उद्गम)

DevanagariHindipublished74 पृष्ठ

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इसलिए अगर मृत्यु से बचना है तो चाहे गृहस्थ हो या विरक्त सबको वीर्य-रक्षण करना ही पड़ेगा अन्यथा भरी जवानी में बिना किसी रोग के ही वृद्ध पुरुष की तरह जर्जर, दुर्बल व ढीला बनना सुनिश्चित है और अकाल मृत्यु भी सुनिश्चित है । अतः शास्त्रों की आज्ञा है –

‘अकामतः स्वयमिन्द्रियस्पर्शनं वीर्यस्खलनं विहाय

वीर्यं शरीरे संरक्ष्य ऊर्ध्वरिताः सततं भव ।’

हाथ से शिश्वेन्द्रिय के द्वारा वीर्य-स्खलन नहीं करो अपितु वीर्य को शरीर में रक्षित कर ऊर्ध्वरिता बनो ।

किसी विशिष्ट चिकित्सक ने कहा है – ‘हस्तमैथुन वह जबरदस्त कुल्हाड़ा है, जिसे अज्ञानी युवक अपने ही हाथों अपने पैरों में मारता है और चेत तब होता है, जब हृदय, मस्तिष्क, आमाशय व मूत्राशय निर्बल हो जाते हैं तथा स्वप्रदोष, शीघ्रपतन, प्रमेह आदि रोग आ घेरते हैं ।’

इस कुकृत्य के कारण बहुत से लोगों का सर्वनाश हो रहा है । अज्ञानता तथा कुसंग के कारण बालक, नवयुवक तथा अन्य भी लोग इस दुष्कर्म में प्रवृत्त हो रहे हैं, प्रारम्भ में तो उन्हें इस क्रिया में बड़ा सुख प्रतीत होता है, पर कुछ दिनों में इसके हानिकारक परिणाम भी उन्हें ज्ञात होने लगते हैं । यदि उस समय भी यह रोग छूट जाय तब कुछ सुधार भी हो जाता है अन्यथा इससे जो रोग उत्पन्न होते हैं, वे स्थायी होते हैं और वे लाखों प्रयत्न करने पर भी आजीवन नहीं मिटते हैं ।

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