ब्रह्मचर्य - स्वस्थ व सुखमय साधना
Brahmacharya - Swasth Va Sukhmay Sadhana
प्रेमवल्लभा शरण द्वारा
स्रोत: 2019 Shri Hit Radha Keli Kunj Trust edition · श्री हित राधा केलि कुञ्ज ट्रस्ट, वृन्दावन · 2019 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंपाती क्योंकि जैसे ही विषय सामने आते हैं तो उनके सामने आते ही सभी प्रतिज्ञायें ताक पर धरी रह जाती हैं । लेकिन फिर भी हिम्मत नहीं हारना है क्योंकि हिम्मत हारकर यदि इस विनाशकारी क्रिया पर नियंत्रण नहीं किया गया तो वीर्य-नाश करने वाले को रोगी, दुर्बल, जर्जर, निरुत्साही और अल्पायु होने से साक्षात् धन्वन्तरी जैसे सामर्थ्यवान वैद्य भी नहीं बचा सकते हैं । संसार में ऐसा कोई वैद्य समर्थ नहीं जो धातुक्षय करने वाले पुरुष को दवा आदि के द्वारा हृष्ट-पुष्ट और दीर्घायु बना सके । उसे बहुत जल्दी मरना पड़ेगा ‘मरणं बिन्दु पातेन’ । महाभारत में एक प्रसंग आया है – विचित्रवीर्य का विवाह हुआ था काशीराज की पुत्री अम्बिका और अम्बालिका से –
तयोः पाणी गृहीत्वा तु रूपयौवनदर्पितः । विचित्रवीर्यो धर्मात्मा कामात्मा समपद्यत ॥ ताभ्यां सह समाः सप्त विहरन् पृथिवीपतिः । विचित्रवीर्यस्तरुणो यक्षमणा समगृह्यत ॥
उन दोनों का पाणिग्रहण करके रूप और यौवन के अभिमान से भरे हुए धर्मात्मा विचित्रवीर्य कामात्मा बन गये और असंयमपूर्ण जीवन के कारण, वे युवावस्था में ही राजयक्ष्मा (टीबी, क्षयरोग) का शिकार होकर अल्पावस्था में ही मृत्यु को प्राप्त हो गए ।
श्रीपादप्रबोधानन्द जी ने लिखा है – ‘भ्रातः किं मरणं ? मृत्यु क्या है ? ‘मलैक निलय स्त्रीपिण्डे भोगस्पृहा’ ‘मल-मूत्र के पिण्ड स्त्री शरीर को भोगने की जो स्पृहा है, वही मृत्यु है ।’
श्रीबिहारिनदेव जी ने भी कहा है –
कंठ कलीली कामिनी जंघ जोँक लगि जोय । लोहू अंग न पाईयै रहो आपकौँ रोय ॥
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