ब्रह्मचर्य - स्वस्थ व सुखमय साधना
Brahmacharya - Swasth Va Sukhmay Sadhana
प्रेमवल्लभा शरण द्वारा
स्रोत: 2019 Shri Hit Radha Keli Kunj Trust edition · श्री हित राधा केलि कुञ्ज ट्रस्ट, वृन्दावन · 2019 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंआरोग्यता ही मनुष्य की सबसे बड़ी सम्पत्ति है । यही चारों पुरुषार्थों की जड़ है -
‘धर्मार्थ काम मोक्षाणामारोग्य मूल मुत्तमम् ।’
धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष का उत्तम साधन आरोग्य ही है और आरोग्यता का सर्वोत्तम साधन है ब्रह्मचर्य । रोगी वही होता है जो भोगी होता है । ज्यों-ज्यों वीर्यशक्ति क्षीण होती है त्यों-त्यों ही मनुष्य दुर्बल व रोगी होता चला जाता है । ब्रह्मचारी पुरुष ही आरोग्य हो सकता है । वैद्यों का कहना है कि १ वर्ष तक यदि कोई ब्रह्मचर्य का पालन करे तो उसके बड़े भयंकर रोग भी जड़मूल से नष्ट हो जाते हैं । व्यभिचारी पुरुष को कदापि आरोग्यता प्राप्त नहीं हो सकती है । अच्छे आहार और औषधियों से आरोग्यता प्राप्त नहीं होती, प्रत्युत वीर्य-रक्षा करने से प्राप्त होती है । वीर्यवान पुरुष ही आरोग्यवान होता है । चरकसंहिता में लिखा है -
आहारस्य परं धाम, शुक्रं तद्-रक्ष्यमात्मनः ।
क्षये यस्य बहून् रोगान्मरणं वा नियच्छति ॥
‘मनुष्य के भोजन का सबसे उत्कृष्ट अंश वीर्य है । अतएव यल सहित उसकी रक्षा करनी चाहिये; क्योंकि वीर्य के क्षय होने से अनेक प्रकार के रोग उत्पन्न होते हैं और इसका अन्तिम परिणाम मृत्यु है ।’
इसलिए आज से, इसी समय से यह दृढ़ संकल्प करो कि हम किसी भी प्रक्रिया के माध्यम से वीर्यपात नहीं करेंगे ।
‘अब लौं नसानी अब न नसैहौं ।’
यद्यपि दीर्घकाल से धातुक्षय होने से अतिशय चंचल एवं दुर्बल चित्त हो जाने के कारण लोग प्रतिज्ञा करके भी संयम नहीं कर पाते हैं। हजारों बार प्रतिज्ञायें करने पर भी एक भी प्रतिज्ञा पूरी नहीं हो
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