ब्रह्मचर्य - स्वस्थ व सुखमय साधना
Brahmacharya - Swasth Va Sukhmay Sadhana
प्रेमवल्लभा शरण द्वारा
स्रोत: 2019 Shri Hit Radha Keli Kunj Trust edition · श्री हित राधा केलि कुञ्ज ट्रस्ट, वृन्दावन · 2019 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें१४. वीर्यवान पुरुष पुरुषार्थी होता है, उसमें दैवीय गुण स्वतः प्रकट हो जाते हैं, उसकी बुद्धि बहुत प्रखर हो जाती है, उसके चित्त में एकाग्रता आ जाती है, वह शक्तिशाली, दृढ़निश्चयी तथा निरोगी होता है ।
१५. वीर्यशक्ति से ही द्वन्द्वों (सुख-दुःख, शीत-उष्ण आदि) को सहने की सामर्थ्य मिलती है ।
१६. ब्रह्मचर्य से बुद्धि कुशाग्र और स्मरण शक्ति तीव्र होती है ।
१७. संसार के समस्त सुख आयु के आधीन हैं और आयु ब्रह्मचर्य के अधीन है ।
१८. शरीर में वीर्य संरक्षित होने पर आँखों में तेज, वाणी में प्रभाव, कार्य में उत्साह एवं प्राण ऊर्जा में अभिवृद्धि होती है ।
१९. वीर्य-रक्षा से शरीर में फुर्ती व चैतन्यता रहती है, आलस्य तथा तन्त्रा नहीं आती है, बीमारियों के आक्रमण को रोकने की शक्ति आती है ।
२०. ब्रह्मचर्य के प्रभाव से बड़ी-से-बड़ी विपत्ति आने पर भी धैर्य नहीं छूटता, कठिनाइयों एवं विघ्न-बाधाओं का वीरता पूर्वक सामना करने की शक्ति मिलती है ।
२१. ब्रह्मचर्य से इन्द्रियाँ सबल रहती हैं, शरीर के अंग-प्रत्यंग सुदृढ़ रहते हैं, आयु बढ़ती है तथा वृद्धावस्था जल्दी नहीं आती है ।
२२. ब्रह्मचर्य ही तप, व्रत, नियम-संयम, योग-ज्ञान, चरित्र और विनय की जड़ है ।
इसीलिए भीष्म पितामह ने कहा है कि तीनों लोकों के साम्राज्य का भले ही त्याग कर देना अथवा इससे भी कोई उत्तम वस्तु हो, उसको भी छोड़ देना किन्तु ब्रह्मचर्य को भंग नहीं करना ।
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