ब्रह्मचर्य - स्वस्थ व सुखमय साधना
Brahmacharya - Swasth Va Sukhmay Sadhana
प्रेमवल्लभा शरण द्वारा
स्रोत: 2019 Shri Hit Radha Keli Kunj Trust edition · श्री हित राधा केलि कुञ्ज ट्रस्ट, वृन्दावन · 2019 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंवीर्य-संरक्षण से होने वाले लाभ
शुक्रं सौम्यं सितं स्निग्धं बल पुष्टिकरं स्मृतम् ।
गर्भबीजं वपुः सारो जीवस्याश्रयमुत्तमम् ॥
‘शुक्र (वीर्य) जीवनी शक्ति का बढ़ाने वाला, श्वेत-वर्ण, चिकना, बल तथा पुष्टिकारक होता है । यह गर्भ का बीज, शरीर का सार रूप तथा जीव का प्रधान आश्रय है ।’
१. वीर्य ही हृदय को पुष्ट बनाता है ।
२. वीर्य से ही सभी अंगों में जीवनी-शक्ति संचालित होती रहती है ।
३. वीर्य से ही मस्तिष्क शान्त और विचार-शक्ति से संपन्न रहता है ।
४. वीर्य से ही निर्भयता, पराक्रम, साहस, उत्साह आदि दिव्य गुणों की वृद्धि होती है ।
५. ‘ब्रह्मचर्य’ जीवन के भव्य भवन निर्माण की आधारशिला है ।
६. वीर्य ही सन्तानोत्पत्ति का मूल है ।
७. ब्रह्मचर्य ही अन्तःकरण की पवित्रता एवं शान्ति बनाए रखने में प्रधान कारण है ।
८. ब्रह्मचर्य ही सदैव स्वस्थ, प्रसन्न व सुखी रहने का अक्षुण्ण उपाय है ।
९. जीवन की सफलता, सुन्दर स्वास्थ्य, हृष्ट-पुष्टता के लिए ब्रह्मचर्य अमृत रूप है ।
१०. दीर्घजीवन का मूल कारण वीर्य-रक्षण ही है । मनुष्य बिना ब्रह्मचर्य धारण किये हुये, कदापि पूर्णायु नहीं हो सकता है ।
११. ब्रह्मचर्य ही सब प्रकार की उन्नति का प्रधान साधन है ।
१२. जो पूर्ण ब्रह्मचारी है, वह मनुष्य नहीं देवता है ।
१३. वीर्य से ही शारीरिक-परिश्रम करने की शक्ति प्राप्त होती है ।
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