भारतकोश
ब्रह्मचर्य - स्वस्थ व सुखमय साधना

ब्रह्मचर्य - स्वस्थ व सुखमय साधना

Brahmacharya - Swasth Va Sukhmay Sadhana

प्रेमवल्लभा शरण द्वारा

स्रोत: 2019 Shri Hit Radha Keli Kunj Trust edition · श्री हित राधा केलि कुञ्ज ट्रस्ट, वृन्दावन · 2019 (उद्गम)

DevanagariHindipublished74 पृष्ठ

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सम्पादकीय निवेदन

आज के दूषित वातावरण अर्थात् दूषित संग, आहार और भौतिकवादी सोच से युक्त शिक्षा प्रणाली के कारण 'विन्दुपात अर्थात् वीर्यनाश करना' यह बालकों एवं युवाओं के मनोरंजन का एक अंग-सा बन गया है; जबकि जिसको वे मनोरंजन (मौज-मस्ती) का अंग समझ रहे हैं, यह सबसे बड़ा महामारी रोग है । यह रोग कैंसर और टीबी आदि से भी ज्यादा खतरनाक और प्राणघातक है क्योंकि उन रोगों की तो औषधि है किन्तु इसकी तो कोई औषधि भी नहीं है ।

इसलिए सावधान! इसको मौज-मस्ती या खेलवाड़ मत समझिये । जो लोग इस रोग से ग्रसित हैं, वे अपनी मृत्यु का स्वयं वर्णन कर रहे हैं क्योंकि वीर्य जीवनीशक्ति है और वीर्य का नाश ही जीवन का नाश (मृत्यु) है । भगवान् शंकर की अकाट्य उक्ति है –

मरणं विन्दुपातेन जीवनं विन्दुधारणात् ।

एवं संरक्षयेद् विन्दुं मृत्युं जयति योगवित् ॥

'विन्दु (वीर्य) का रक्षण (धारण) ही जीवन है और उसका क्षय (नाश) ही मृत्यु है । अतः वीर्य की (सर्वतोभावेन) रक्षा करनी चाहिए, उससे योगवेत्ता पुरुष मृत्यु को जीत लेता है ।'

जो वीर्य के साथ खेलवाड़ करते हैं निःसंदेह वे किसी योग्य नहीं रह जाते हैं अर्थात् सारहीन हो जाते हैं और जो वीर्य को धारण करते हैं, वे अमरत्व प्राप्त कर लेते हैं अर्थात् देवत्व को प्राप्त या भगवत्स्वरूप हो जाते हैं ।

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