ब्रह्मचर्य - स्वस्थ व सुखमय साधना
Brahmacharya - Swasth Va Sukhmay Sadhana
प्रेमवल्लभा शरण द्वारा
स्रोत: 2019 Shri Hit Radha Keli Kunj Trust edition · श्री हित राधा केलि कुञ्ज ट्रस्ट, वृन्दावन · 2019 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंअतः हमें यदि मृत्यु से अमरता की ओर जाना है 'मृत्योर्मा अमृतं गमय' तो इसके लिए संयम परमावश्यक है ।
वीर्य का नाश करने वाले लोग भयानक रोगों से ग्रसित हो जाते हैं, उनका जीवन सुख-शान्ति से रहित अर्थात् दुःखमय हो जाता है, जवानी में ही बुढ़ापे के सारे लक्षण उनमें प्रकट हो जाते हैं और उनकी विचार-शक्ति भी इतनी दुर्बल हो जाती है कि वे घोर विषयों के गुलाम हो जाते हैं, परमार्थ-पथ पर भी चलने लायक नहीं रह जाते क्योंकि श्रुतियों में लिखा है -
‘नायमात्मा बलहीनेन लभ्यः’ (मुण्डकोपनिषद्)
‘जो बलहीन है, वह भगवत्प्राप्ति नहीं कर पाता है ।’
बलहीन होने से तात्पर्य न वे एकरस भजन कर पाते हैं और न उनमें काम-क्रोधादि वेगों को या प्रतिकूलता आदि को सहने की ही सामर्थ्य रह जाती है; क्योंकि ‘वीर्य का हास’ हो जाने के कारण आत्मबल का उनमें अत्यन्ताभाव हो जाता है । ‘आत्मबल’ बिन्दु धारण करने से प्राप्त होता है । महर्षि पतञ्जलिजी ने योग-दर्शन में लिखा है - ‘ब्रह्मचर्य प्रतिष्ठायां वीर्यलाभः’ (साधनपाद ३८)
‘ब्रह्मचर्य की सम्यक् प्रतिष्ठा (टढ़ स्थिति) हो जाने पर सामर्थ्य का लाभ होता है अर्थात् आत्मबल की प्राप्ति होती है ।’
जो ब्रह्मचर्य से रहित जन हैं उनका मन भजन के लिए निरुत्साहित होने लगता है । ऐसी स्थिति में अगर सत्संग प्राप्त न हो तो ऐसे लोग एक निकृष्ट भावना और नास्तिकता का शिकार होकर दुःख व अशान्ति के कारण आत्महत्या तक करने की सोच बैठते हैं ।
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