भारतकोश
संग्रह पर लौटें

ब्रह्मचर्य - स्वस्थ व सुखमय साधना

Brahmacharya - Swasth Va Sukhmay Sadhana

प्रेमवल्लभा शरण द्वारा

स्रोत: 2019 Shri Hit Radha Keli Kunj Trust edition · श्री हित राधा केलि कुञ्ज ट्रस्ट, वृन्दावन · 2019 (उद्गम)

DevanagariHindipublished74 पृष्ठ

सम्पादकीय निवेदन

आज के दूषित वातावरण अर्थात् दूषित संग, आहार और भौतिकवादी सोच से युक्त शिक्षा प्रणाली के कारण 'विन्दुपात अर्थात् वीर्यनाश करना' यह बालकों एवं युवाओं के मनोरंजन का एक अंग-सा बन गया है; जबकि जिसको वे मनोरंजन (मौज-मस्ती) का अंग समझ रहे हैं, यह सबसे बड़ा महामारी रोग है । यह रोग कैंसर और टीबी आदि से भी ज्यादा खतरनाक और प्राणघातक है क्योंकि उन रोगों की तो औषधि है किन्तु इसकी तो कोई औषधि भी नहीं है ।

इसलिए सावधान! इसको मौज-मस्ती या खेलवाड़ मत समझिये । जो लोग इस रोग से ग्रसित हैं, वे अपनी मृत्यु का स्वयं वर्णन कर रहे हैं क्योंकि वीर्य जीवनीशक्ति है और वीर्य का नाश ही जीवन का नाश (मृत्यु) है । भगवान् शंकर की अकाट्य उक्ति है –

मरणं विन्दुपातेन जीवनं विन्दुधारणात् ।

एवं संरक्षयेद् विन्दुं मृत्युं जयति योगवित् ॥

'विन्दु (वीर्य) का रक्षण (धारण) ही जीवन है और उसका क्षय (नाश) ही मृत्यु है । अतः वीर्य की (सर्वतोभावेन) रक्षा करनी चाहिए, उससे योगवेत्ता पुरुष मृत्यु को जीत लेता है ।'

जो वीर्य के साथ खेलवाड़ करते हैं निःसंदेह वे किसी योग्य नहीं रह जाते हैं अर्थात् सारहीन हो जाते हैं और जो वीर्य को धारण करते हैं, वे अमरत्व प्राप्त कर लेते हैं अर्थात् देवत्व को प्राप्त या भगवत्स्वरूप हो जाते हैं ।

i

Scanned with CamScanner

अतः हमें यदि मृत्यु से अमरता की ओर जाना है 'मृत्योर्मा अमृतं गमय' तो इसके लिए संयम परमावश्यक है ।

वीर्य का नाश करने वाले लोग भयानक रोगों से ग्रसित हो जाते हैं, उनका जीवन सुख-शान्ति से रहित अर्थात् दुःखमय हो जाता है, जवानी में ही बुढ़ापे के सारे लक्षण उनमें प्रकट हो जाते हैं और उनकी विचार-शक्ति भी इतनी दुर्बल हो जाती है कि वे घोर विषयों के गुलाम हो जाते हैं, परमार्थ-पथ पर भी चलने लायक नहीं रह जाते क्योंकि श्रुतियों में लिखा है -

‘नायमात्मा बलहीनेन लभ्यः’ (मुण्डकोपनिषद्)

‘जो बलहीन है, वह भगवत्प्राप्ति नहीं कर पाता है ।’

बलहीन होने से तात्पर्य न वे एकरस भजन कर पाते हैं और न उनमें काम-क्रोधादि वेगों को या प्रतिकूलता आदि को सहने की ही सामर्थ्य रह जाती है; क्योंकि ‘वीर्य का हास’ हो जाने के कारण आत्मबल का उनमें अत्यन्ताभाव हो जाता है । ‘आत्मबल’ बिन्दु धारण करने से प्राप्त होता है । महर्षि पतञ्जलिजी ने योग-दर्शन में लिखा है - ‘ब्रह्मचर्य प्रतिष्ठायां वीर्यलाभः’ (साधनपाद ३८)

‘ब्रह्मचर्य की सम्यक् प्रतिष्ठा (टढ़ स्थिति) हो जाने पर सामर्थ्य का लाभ होता है अर्थात् आत्मबल की प्राप्ति होती है ।’

जो ब्रह्मचर्य से रहित जन हैं उनका मन भजन के लिए निरुत्साहित होने लगता है । ऐसी स्थिति में अगर सत्संग प्राप्त न हो तो ऐसे लोग एक निकृष्ट भावना और नास्तिकता का शिकार होकर दुःख व अशान्ति के कारण आत्महत्या तक करने की सोच बैठते हैं ।

ii

Scanned with CamScanner

एस अनेकानेक उदाहरण पूज्य सद्गुरुदेव रसिक संत श्री हित प्रेमानंद गोविंद शरण जी महाराज के समक्ष भी आये, अतः पूज्य महाराजश्री ने इस जटिल समस्या से मुक्ति पाने के लिए दैनिक सत्संग में धातुक्षय से होने वाली हानियाँ एवं ब्रह्मचर्य को साधने की जो युक्तियाँ साधकों को बताईं, उनको 'सर्वजन हिताय सर्वजन सुखाय' अर्थात् 'सर्वे भवन्तु सुखिनः सर्वे सन्तु निरामयाः' (सभी सुखी एवं रोगमुक्त हों) की भावना से यहाँ लिपिबद्ध किया गया है, जिसका प्रकाशन ऐसे उत्साहहीन रोगियों के लिए परमौषधी स्वरूप सिद्ध होगा क्योंकि इस रोग का जड़मूल से निवारण लौकिक औषधियों से नहीं अपितु अध्यात्मिक ज्ञान से ही सम्भव है ।

वृन्दावन

दिनांक ०८.१२.२०१९

श्रीहित कृपापात्र

प्रेमवल्लभा शरण

Scanned with CamScanner

विषय-सूची

मानव देह की दुर्लभता .....
ब्रह्मचर्य (विन्दु-संरक्षण) .....
वीर्य-संरक्षण से होने वाले लाभ .....१४
‘हस्त-मैथुन’ एक प्राणघातक रोग .....१६
वीर्यक्षय से होने वाली हानियाँ .....२०
शुक्र (वीर्य) के निर्माण की प्रक्रिया .....२३
गृहस्थ में रहते हुए ब्रह्मचर्य से कैसे रहें ? .....२५
अष्टांग मैथुन का त्यागी ही सच्चा ब्रह्मचारी .....३३
ब्रह्मचर्य में लाभकारी आहार एवं दिनचर्या .....४१
पवित्र मन के द्वारा ही ब्रह्मचर्य संभव .....४८
ब्रह्मचर्य सम्बन्धी साधकों की कुछ जिज्ञासाएँ .....५५

Scanned with CamScanner

मनुष्य देह की दुर्लभता

मनुष्य जीवन का चरम लक्ष्य है - भगवत्प्राप्ति अर्थात् महासुख में निमग्न होना । इसी प्रयोजन की सिद्धि के लिए प्रभु ने अहंता की कृपा-करुणा करके यह देवदुर्लभ अर्थात् 'भव अज कठिन मुनीजन दुर्लभ' मानव देह हमें दिया है - 'कबहुँक करि करना नर देही । देत ईस बिनु हेतु सनेही ॥' ऐसा सभी शास्त्रों का कथन एवं समस्त संत-महापुरुषों का अनुभव रहा है । श्रीमद्भागवत में महाराज निमि (जनकजी) नवयोगेश्वरों के समक्ष कह रहे हैं -

दुर्लभो मानुषो देहो देहिनां क्षणभंगुरः । (११/२/२९)

'मनुष्य शरीर की प्राप्ति बड़ी दुर्लभ है, यदि प्राप्त भी हो जाए तो यह क्षणभंगुर है ।' जगद्वर आद्यशंकराचार्य जी भी कहते हैं -

दुर्लभं त्रयमेवैतद् देवानुग्रहहेतुकम् ।

मनुष्यत्वं मुमुक्षत्वं महापुरुषसंश्रयः ॥ (विवेक चूड़ामणि)

'तीन चीजें बड़ी दुर्लभ हैं - मनुष्य जन्म, मुमुक्षता अर्थात् मुक्ति की इच्छा और महापुरुषों का संग; यह तीनों चीजें प्रभु की कृपा से ही प्राप्त होती हैं ।' श्रीसूरदास प्रभृति महापुरुष भी लिखते हैं -

हरि! तुम बहुत अनुग्रह कीन्हों ।

साधन-धाम बिबुध दुरलभ तनु, मोहि कृपा करि दीन्हों ॥

अतः बड़ी कठिनाई से प्राप्त होने के बाद भी ये नरदेह क्षणभंगुर है अर्थात् किसी को पता नहीं है, किस क्षण हमारे शरीर में कौन-सी भयानक घटना घटेगी और यह अमूल्य मनुष्य जीवन समाप्त हो जायेगा । इसीलिये श्रीप्रह्लाद जी महाराज ने असुर बालकों को शिक्षा देते हुए कहा है -

1

Scanned with CamScanner

कौमार आचरेत्प्राज्ञो धर्मान् भागवतानिह ।

दुर्लभं मानुषं जन्म तदप्यध्वुवमर्थदम् ॥ (श्रीमद्भगवद्गीता ७/६/१)

‘इस लोक में बुद्धिमान पुरुष को चाहिए कि वह कुमारावस्था से ही भजन परायण हो जाये; क्योंकि सर्वविध पुरुषार्थों की प्राप्ति कराने वाला मनुष्य जन्म बड़ा दुर्लभ है, तथा प्राप्त होने पर भी क्षणभंगुर है यानी किस समय मृत्यु आ जाए किसी को पता नहीं ।’

इसीलिये अभी जो समय मिला है, इसी में हमें प्रतिक्षण सावधान होकर इस दुर्लभ शरीर से परमलाभ प्राप्त करने के लिये पूर्ण प्रयत्नशील रहना है और ऐसे मलिन कर्म नहीं करने हैं कि जिनसे कर्म-बंधन से युक्त होकर के नाना प्रकार की कुत्सित योनियों में भटककर नाना प्रकार के दुःख (कष्ट) भोगने पड़ें । भगवान् श्रीकृष्ण श्रीमद्भगवत् के एकादश स्कंध में श्रीउद्धवजी से कह रहे हैं -

एषा बुद्धिमतां बुद्धिर्मनीषा च मनीषिणाम् ।

यत् सत्यमनूतेनेह मर्त्येनाप्नोति मामृतम् ॥ (११/२९/२२)

‘हे उद्धव! विवेकियों का विवेक और चतुरों की चतुराई यही है कि वे इस विनाशी एवं असत्य शरीर के द्वारा मुझ अविनाशी एवं सत्यतत्त्व को प्राप्त कर लें ।’

यह मनुष्य जीवन विषयासक्ति से युक्त होकर बंधन में आने के लिए नहीं बल्कि बन्धन से मुक्त होने के लिये है ।

श्रुतियों में लिखा है कि असत् से सत् की ओर, अंधकार से प्रकाश की ओर और मृत्यु से अमरता की ओर चलने के लिए यह शरीर मिला है -

असतो मा सद्गमय, तमसो मा ज्योतिर्गमय,

मृत्योर्मामृतं गमय ॥ (बृहदारण्यकोपनिषद्)

Scanned with CamScanner

विचार कीजिये, अगर हमने विवेक प्रधान मनुष्य योनि में आवागमन के चक्र से मुक्त होकर के प्रभु के चरणारविन्दों की प्राप्ति नहीं की तो फिर किस योनि में कर पायेंगे ।

इसलिए सावधान ! नाना प्रकार के भोगों का संग्रह करना और भोग भोगना, यह मनुष्य जीवन का लक्ष्य नहीं है ।

कूकर शूकर करत हैं विष विषया को भोग ।

तुलसी वृथा न खोइये, यह तन भजिबे जोग ॥

अरे ! आहार, निद्रा, भय और मैथुन - ये तो हर योनियों के जीवों को प्राप्त होते हैं, अगर मनुष्य योनि में भी हम इन्हीं विषयों के सेवन में अमूल्य जीवन को नष्ट कर रहे हैं तो यह बड़ी हानि का विषय है । महाप्रभु श्रीहरिवंश चन्द्रजू महाराज कहते हैं -

मानुष कौ तन पाय, भजौ ब्रजनाथ कौ ।

दर्वी लैं कै मूढ़, जरावत हाथ कौ ॥ (स्फुटवाणी)

यह देह वासनाओं की पूर्ति के लिए नहीं बल्कि उपासना के लिये प्रभु द्वारा कृपा करके दिया गया है ।

सुनहु उमा ते लोग अभागी ।

हरि तजि होहिं बिषय अनुरागी ॥ (मानस. ३/३३)

अगर अभी हम सावधान नहीं हुए - शरीर, मन, वाणी को प्रभु की उपासना में नहीं लगाया तो जन्म-जन्मान्तर तक बहुत पछताना पड़ेगा -

मन पछितैहै अवसर बीते ।

दुरलभ देह पाइ हरिपद भजु, करम बचन अरु ही ते ॥

ऐसा मत समझिये कि अगला जन्म हमको मनुष्य का ही मिलेगा और पुनः भजन करने का ऐसा अवसर प्राप्त होगा । अगला मनुष्य का जन्म उनको मिलता है जो सदा साधन परायण रहे हैं किन्तु किसी कारण से योगभ्रष्ट हो गए अर्थात् प्रभु से उनका योग नहीं हो

3

Scanned with CamScanner

पाया तो प्रभु कृपा करके उन्हें पुनः अवसर दे देते हैं, पर जो इस अवसर को प्रमाद में, शास्त्र और सन्तों की आज्ञा का उल्लंघन करके, अमर्यादित चेशाओं के द्वारा नष्ट करता है तो उस पर प्रभु कुपित हो जाते हैं कि हमने करुणा करके इसे मनुष्य शरीर दिया और इसने प्रमादयुक्त होकर, शास्त्र विरुद्ध आचरण करके, उस अमूल्य जीवन को नष्ट किया; अतः फिर उसको प्रभु नारकीय योनियों में अर्थात् तिर्यक् योनियों में भेज देते हैं, जहाँ उसे नाना प्रकार के कष्ट सहने पड़ते हैं । गीताजी में प्रभु ने स्वयं कहा है -

प्रसक्ताः कामभोगेषु पतन्ति नरकेऽशुचौ ॥ (१६/१६)

'विषय-भोगों में अत्यन्त आसक्त लोग अपवित्र नरक में गिरते हैं।' काम, क्रोध, लोभ ये नरक के दरबाजे हैं -

त्रिविधं नरकस्येदं द्वारं नाशनमात्मनः ।

कामः क्रोधस्तथा लोभस्तस्मादेतत्तयं त्यजेत् ॥ (१६/२१)

इसी मनुष्य योनि में ही हम अपना हित कर सकते हैं । अन्य योनियाँ तो भोगयोनि हैं, उनमें यह स्वतंत्रता नहीं है कि हम नवीन कर्म करके प्रभु की प्राप्ति कर सकें । उनके प्रारब्धानुसार शुभकर्म बन जायें तो बन जायें अन्यथा विवेक के द्वारा वे नवीन कर्म करने की योग्यता नहीं रखते हैं ।

अन्य जो भी योनियाँ हैं, चाहे वे देवयोनि ही क्यों न हों, वे सब भोगयोनि के अन्तर्गत ही आते हैं क्योंकि वे भी स्वर्ग में अपने शुभकर्मों का भोग कर रहे हैं । जैसे नरक में अशुभ कर्म का भोग है, वैसे ही स्वर्ग में शुभकर्मों का भोग है । एक मृत्युलोक में ही और उसमें भी यह मनुष्य शरीर ही ऐसा है जिसमें प्रारब्धानुसार प्राप्त शुभ और अशुभ कर्मों को भोगते हुए नवीन कर्म करके अर्थात् भगवद् उपासना करके शुभ-अशुभ दोनों कर्मों से ऊपर उठा जा सकता है ।

Scanned with CamScanner

श्रीहिताचार्यचरण स्फुटवाणी में कहते हैं -

तैं भाजन कृत जटित विमल चंदन कृत इन्धन ।

अमृत पूरि तिहि मध्य करत सरषप खल रिंधन ॥

जैसे कोई विविध रत्नों से जटित स्वर्णपात्र में अमृत भरकर उसे चूल्हे पर चढ़ाकर चन्दन की लकड़ी से अग्नि प्रज्वलित करके उसमें सरसों की खली को रँधे तो वह पुरुष मन्दमति नहीं तो क्या कहा जाएगा ? ऐसे ही यह मनुष्य शरीर स्वर्णपात्र की भाँति दुर्लभ है और यह रत्नजटित अर्थात् समस्त दैवीय सम्पदा (सदुणों) से संपन्न है तथा इसमें ज्ञान-विज्ञान रूपी अमृत भरा हुआ है, जो अभागी मनुष्य श्वाँसों को खर्चा करके अर्थात् जलाकर इसमें विषय-भोग रूपी खली को रँधता है तो वह महामूर्ख नहीं तो क्या है ? फिर दूसरे रूपक में श्रीहरिवंशचन्द्र जू कहते हैं -

अद्भुत धर पर करत कष्ट कंचन हल वाहत ।

बार करत पाँवार मंद बोवन विष चाहत ॥

अद्भुत भूमि में कष्ट करके कंचन के हल से उसे जोतकर उसमें मूँगे की बाड़ लगाकर, उसमें तुम विष बोना चाहते हो। इसीलिये सावधान! यह मनुष्य शरीर बड़ा दुर्लभ है और यह नरदेह ही ऐसी भूमि है जिसमें हम शुभ-अशुभ कर्म रूपी धान्य बोकर स्वर्ग-नरक कुछ भी प्राप्त कर सकते हैं अथवा प्रभु की आराधना करके मोक्षपद या भगवत्प्रेम प्राप्त कर सकते हैं, समस्त पुरुषार्थों को देने वाला यह मनुष्य देह है ।

जैश्री हित हरिवंश विचारि कै मनुज देह गुरु-चरन गहि ।

सकहि तौ सब परपंच तजि कृष्ण-कृष्ण गोविन्द कहि ॥

Scanned with CamScanner

अतः इस शरीर का दुरुपयोग मत करो, गुरु-चरणों का आश्रय ग्रहण कर और यदि संभव हो तो सकल प्रपंच का त्याग करके प्रभु की उपासना में इस शरीर को लगाओ ।

जो हम दुर्लभ मनुष्य शरीर को विषय-भोगों में नष्ट कर रहे हैं, यह बहुत हानि की बात है ।

‘हीरा जनम अमोल है कौड़ी बदले जाय ।’

यद्यपि प्रमाद और अविद्या के कारण यह बात हमारे समझ में नहीं आ रही है; जबकि हमारी इस दशा को देखकर पशु भी हँसते हैं कि ‘देखो, यह कितना मूढ़ है ! इसे मनुष्य शरीर मिला है । यह भजन करके प्रभु को प्राप्त कर सकता है, पर हम जैसे पशुओं की भाँति यह भोगों को ही जीवन का सार समझ रहा है ।’ ऐसे कहकर पशु हम मनुष्यों पर हँसते हैं । श्रीमद्भागवत में ग्यारहवें स्कंध में लिखा है -

त्वङ्मांसरुधिरस्त्रायुमेदोमज्जास्थिसंहतौ ।

विष्णुमूत्रपूये रमतां कृमीणां कियदन्तरम् ॥ (११/२६/२१)

‘यह शरीर त्वचा, माँस, रक्त, स्त्रायु, मेद, मज्जा और अस्थि आदि से निर्मित है और इसमें मल-मूत्र, पीव आदि भरे हुए हैं, अतः ऐसे घृणित शरीर में जो रमण करता है, उसमें और मल-मूत्र के कीड़ों में क्या अन्तर रहा?’

प्रभु ने बहुत करुणा करके हमें मनुष्य शरीर दिया है, इसलिये हमें सतत् भजन परायण रहना है और विषय-सुख के लिए अपने अमूल्य जीवन को नष्ट नहीं करना है ।

श्रीरामचरितमानस में भगवान् राम ने प्रजाजनों को यही उपदेश दिया है -

बढ़ैं भाग मानुष तनु पावा । सुर दुर्लभ सब ग्रंथन्हि गावा ॥

साधन धाम मोच्छ कर द्वारा । पाइ न जेहिं परलोक सँवारा ॥

6

Scanned with CamScanner

सो परत्र दुख पावइ सिर धुनि धुनि पछिताइ । कालहि कर्मीहि ईस्वरहि मिथ्या दोष लगाइ ॥ एहि तन कर फल बिषय न भाई । स्वर्गउ स्वल्प अंत दुखदाई ॥ नर तनु पाइ बिषयँ मन देहीं । पलटि सुधा ते सठ बिष लेहीं ॥ नर तनु भव बारिधि कहुँ बेरो । सन्मुख मरुत अनुग्रह मेरो ॥ करनधार सदगुर दृढ़ नावा । दुर्लभ साज सुलभ करि पावा ॥ जो न तँरै भव सागर नर समाज अस पाइ । सो कृत निंदक मंदमति आत्माहन गति जाइ ॥ (७/४३,४४)

श्रीमद्भागवत में भी यही बात लिखी है -

लब्ध्वा सुदुर्लभमिदं बहुसम्भवान्ते मानुष्यमर्थदमनित्यमपीह धीरः । तूर्णं यतेत न पतेदनुमृत्यु यावन्निःश्रेयसाय विषयः खलु सर्वतः स्यात् ॥

'इस संसार में अनित्य होने पर भी अनेक जन्मों के बाद पुरुषार्थ को देने वाले इस दुर्लभ मनुष्य शरीर को पाकर जबतक मृत्यु नहीं आती है, धीर पुरुषों को चाहिए कि वे तबतक मोक्ष प्राप्ति के लिए शीघ्र ही प्रयत्न कर लें; विषय-भोगों में इस जीवन को नष्ट न करें क्योंकि विषय-भोग तो अन्य योनियों में भी प्राप्त हो सकते हैं ।'

तस्यैव हेतोः प्रयतेत कोविदो न लभ्यते यद्भ्रमतामुपर्यधः ।

तल्लभ्यते दुःखवदन्व्यतः सुखं कालेन सर्वत्र गभीररंहसा ॥

(१/५/१८)

'ऊँची-नीची नाना योनियों में भ्रमण करने पर भी भाग्यवश जिस वस्तु (प्रभु की) प्राप्ति नहीं होती है, विवेकीजनों को उसी वस्तु की प्राप्ति अर्थात् प्रभु की प्राप्ति के लिए ही प्रयत्न करना चाहिए, विषयों की प्राप्ति के लिए नहीं; क्योंकि विषय सुख तो कालक्रम से दुखवत् (जैसे दुःख प्राप्ति के लिए कोई प्रयास नहीं करता) बिना प्रयास के सब योनियों में प्राप्त हो जाता है ।'

7

Scanned with CamScanner

स वञ्चितो बतात्मधृक् कृच्छ्रेण महता भुवि ।

लब्ध्वापवर्ग्य मानुष्यं विषयेषु विषज्जते ॥ (श्रीमद्भगवद्गीता ४/२३/२८)

‘इस भूलोक (कर्मभूमि) में बड़ी कठिनाई से प्राप्त मोक्षप्रद मनुष्य शरीर को पाकर के भी विषयों में जो आसक्त हो जाता है, वह आत्महत्यारा है और माया के द्वारा ठगा गया है ।’

अतः कुछ समय के लिए हमको ये मनुष्य जीवन दिया गया है, इसमें चाहे हम दुराचार करके नारकीय यातनाओं को भोगने की तैयारी कर लें या संयम-सदाचार पूर्वक चलकर प्रभु की उपासना करके, संसृति से हमेशा के लिए मुक्ति प्राप्त कर लें ।

Scanned with CamScanner

ब्रह्मचर्य (बिन्दु-संरक्षण)

‘ब्रह्मचर्य’ का अभिप्राय वीर्य-रक्षा से है । वीर्य सम्पूर्ण शरीर का सार है । प्रभु के द्वारा प्रदान की गयी जीवनी-शक्ति (वीर्य) यह प्रभु की अद्भुत कृपा है । मनुष्य जिस मार्ग में भी चलना चाहे, ब्रह्मचर्य (बिन्दु-संरक्षण) से उसको बहुत बड़ा बल यानी बहुत बड़ी सामर्थ्य मिलती है क्योंकि ब्रह्मचर्य सम्पूर्ण शक्तियों का खजाना है -

‘वीर्यमेव बलम्, बलमेव वीर्यम् ।’

वीर्य ही बल है और बल का नाम ही वीर्य है । आज तक संसार में जितने भी बड़े-बड़े बलवान् योद्धा या प्रतिभावान् पुरुष हुए, सबको ब्रह्मचर्य का आश्रय लेना पड़ा क्योंकि बिना वीर्यरक्षा के शारीरिक बल तथा मनोबल किसी को प्राप्त हो ही नहीं सकता है ।

दीर्घ-जीवन, उत्तम-स्वास्थ्य, दिव्य-ज्ञान तथा अखण्ड-स्मृति आदि की प्राप्ति के लिए ब्रह्मचर्य ही परम साधन है । यहाँ तक कि -

‘ब्रह्मर्चण तपसा देवा मृत्युमपाश्रत ।’

ब्रह्मचर्य रूपी तप से देवताओं ने मृत्यु तक को जीत लिया अर्थात् अमरत्व की प्राप्ति की । ऐसी सामर्थ्य ब्रह्मचर्य में है । लेकिन आज का दूषित वातावरण अमरत्व या देवत्व प्रदायक ब्रह्मचर्य को धूलि-धूसरित कर रहा है । जिसको आज के लोग मनोरंजन (मौज-मस्ती) समझ रहे हैं वह सर्वनाश का रास्ता है -

‘आयुर्वीर्यं यशश्चैव हन्यतेऽब्रह्मचर्या ।’

अर्थात् ब्रह्मचर्य के हास से आयु, वीर्य, यश, सुख, आरोग्य, तेज, बल (सामर्थ्य), विद्या, धर्म और भजन आदि सबका नाश हो जाता है ।

9

Scanned with CamScanner

जो धर्म-मर्यादा, शास्त्र-मर्यादा का उल्लंघन करके ब्रह्मचर्य को नष्ट कर रहे हैं, क्या वे कभी स्वप्न में भी सुख या शान्ति प्राप्त कर सकते हैं ? भगवान् श्रीकृष्ण के वचन हैं -

यः शास्त्रविधिमुत्सृज्य वर्तते कामकारतः ।

न स सिद्धिमवाप्नोति न सुखं न परां गतिम् ॥ (गी. १६/२३)

‘जो पुरुष शास्त्र विधि की अवहेलना करके, मनमाना आचरण करता है, उसे न सिद्धि प्राप्त होती है, न परमगति और न ही सुख-शान्ति ।’

इसलिए सदैव शास्त्र और संतों की बनायी हुई मर्यादा के अनुसार ही सबको चलना चाहिए, तभी लोक और परलोक दोनों में सुख और शान्ति प्राप्त हो सकती है अन्यथा असंभव है ।

ये जो आजकल चल रहा है यानी वीर्य का मनोरंजन में नाश किया जा रहा है, ये बहुत ही हानिकारक है । जिसके जीवन में है, वह तुरंत छोड़ दे । जिस वीर्य-शक्ति से सुन्दर संतान की उत्पत्ति होती है, उसी वीर्य शक्ति को जो मनोरंजन में नष्ट कर रहे हैं, वे हत्यारे हैं। गोरखनाथ जी ने लिखा है -

वीर्य की एक बूँद में जीव बसें नौ लाख ।

मन मरोर नारी तजी यह गोरख की साख ॥

वीर्य की एक बूँद में नौ लाख जीव होते हैं, एक बूँद वीर्य-नाश से असंख्य जीवों की हत्या होती है । योग-दर्शन के भाष्य में भाष्यकार श्रीवेदव्यास जी ने भी लिखा है - ‘नानुपहत्य भूतानि विषयोप-भोगः सम्भवति ।’ बिना हिंसा के भोग नहीं होता है । इसलिए ब्रह्मचर्य नष्ट करने वाला हिंसक होता है; इसका दण्ड उसे जरूर भोगना पड़ेगा । यद्यपि संतानोत्पत्ति की इच्छा से यदि ब्रह्मचर्य खण्डित किया गया है

10

Scanned with CamScanner

तो वह शास्त्रज्ञा के अन्तर्गत माना जाएगा लेकिन वासना से प्रेरित होकर के ब्रह्मचर्य नष्ट करना, वो हिंसा है । शास्त्रों में लिखा है –

‘व्यर्थीकारेण शुक्रस्य ब्रह्महत्यामवाप्नुयात् ।’

वृथा वीर्य का नाश करने से ब्रह्म-हत्या का पाप लगता है ।

जो पूर्ण ब्रह्मचारी है, उसको विशेष साधना नहीं करनी पड़ती है; उसे स्वतः अखण्ड भगवत्सृति होने लगती है ।

श्रीशंकराचार्य जी ने लिखा है – ‘ब्रह्मचर्य की अखण्डता से सहज ही परमात्मदर्शन होता है ।’

कोई सोच भी नहीं सकता है कि ब्रह्मचारी को कितना आनंद प्राप्त होता है ‘ब्रह्मचारी न काञ्चन आर्तिमाच्छ्रुति ।’ ब्रह्मचारी को कभी किसी प्रकार का कष्ट नहीं होता किन्तु जो मृगतृष्णातुल्य काम-सुख के चक्र में ब्रह्मचर्य क्षीण करते हैं वे घोर पतन, घोर अशांति की ओर जाते हैं । श्रीभर्तृहरि जी ने वैराग्यशतक में लिखा है कि ‘भोगा न भुक्ता वयमेव भुक्ताः’ हम भोगों को नहीं भोग पाये, प्रत्युत भोगों ने हमको ही भोग लिया अर्थात् नष्ट कर डाला ।

संसार में प्रत्येक व्यक्ति आरोग्य और दीर्घ जीवन की इच्छा रखता है । उत्तम स्वास्थ्य व दीर्घजीवी बनने के लिए आयुर्वेद में शरीर रूपी भवन के तीन उपस्तम्भ बताए गए हैं – आहार, निद्रा, और ब्रह्मचर्य ।

‘त्रय उपस्तम्भाः आहारः स्वप्नो ब्रह्मचर्यमिति’

यदि इनमें से एक भी ठीक नहीं होता है तो शरीर रूपी मकान जर्जर होकर गिर जाता है ।

इसलिए वीर्य के संरक्षण से ही मनुष्य स्वस्थ और सुखी रह सकता है । व्यभिचारी पुरुष प्रायः अस्वस्थ और दुखी देखे जाते हैं क्योंकि वे अपने वीर्य का नाश कर इस अवस्था को पहुँचते हैं, ‘वीर्य

11

Scanned with CamScanner

रक्षति रक्षितम्' जो अपने वीर्य की रक्षा करता है, वह (वीर्य) भी उम्र का संरक्षण करता है । दीर्घजीवन और उत्तम स्वास्थ्य के लिए ब्रह्मचर्य साधना बहुत आवश्यक है । 'नष्टे शुक्ले सर्व रोगा भवन्ति ।' वीर्य के अभाव में ही अनेक रोग उत्पन्न होते हैं ।

अतः जो अपने स्वास्थ्य और आरोग्य को स्थिर रखते हुए मुखां जीवन को व्यतीत करने के इच्छुक हैं, उन्हें प्रयत्नपूर्वक वीर्यरक्षा करनी चाहिए ।

ब्रह्मचर्य-प्रतिष्ठायां वीर्य-लाभो भवत्यपि ।

सुरत्वं मानवो याति चान्तेयाति परांगतिम् ॥

'ब्रह्मचर्य का पालन करने से वीर्य का लाभ होता है । ब्रह्मचर्य की रक्षा करने वाले मनुष्य को सुरत्व की प्राप्ति होती है, और अन्त में परम गति भी उसे मिलती है ।

मृत्युव्याधिजरानाशी पीयूषं परमौषधम् ।

ब्रह्मचर्यं महद्यत्वं सत्यमेव वदाम्यहम् ॥

शान्तिं कान्तिं स्मृतिं ज्ञानमारोग्यञ्चापि सन्ततिम् ।

यद्वच्छति महद्भर्मं ब्रह्मचर्यं चरेदिह ।

'मृत्यु, व्याधि और जरा को नाश करने वाला, अमृत के समान महौषध ब्रह्मचर्य है । इसलिए शान्ति, कान्ति, स्मृति, ज्ञान और आरोग्य तथा संतान, इनकी जो पुरुष इच्छा करता है, वह ब्रह्मचर्य का पालन करे ।'

अखण्ड नैष्ठिक ब्रह्मचारी श्रीभीष्म पितामह धर्मराज युधिष्ठिर को ब्रह्मचर्य का उपदेश देते हुए कहते हैं कि -

आजन्म भर्गाद्यस्तु ब्रह्मचारी भवेदिह ।

न तस्य किंचिदप्राप्यमिति विद्धि नराधिप ।

बहु-कोटि ऋषीणाञ्च ब्रह्मलोके वसन्त्युत ॥

12

Scanned with CamScanner

‘जो आजन्म ब्रह्मचारी रहता है उसे संसार में कुछ भी दुःख नहीं होता है और उस पुरुष को कोई वस्तु दुर्लभ नहीं । ब्रह्मचर्य के प्रभाव से करोड़ों ऋषि ब्रह्मलोक में वास कर रहे हैं ।’

उपनिषदों में भी यही बात लिखी है –

तद्य एवैतं ब्रह्मलोकं ब्रह्मचर्येणानुविन्दन्ति,

तेषामेवैष ब्रह्मलोकः, तेषां सर्वेषु लोकेषु कामचारे भवति ॥

(छान्दोग्योपनिषद्)

‘जो इस ब्रह्मलोक को ब्रह्मचर्य के द्वारा जानते हैं, उन्हीं को यह ब्रह्मलोक प्राप्त होता है तथा जो ब्रह्मचर्य से युक्त पुरुष हैं, वे सभी लोकों में विचरण कर सकते हैं ।’

Scanned with CamScanner

वीर्य-संरक्षण से होने वाले लाभ

शुक्रं सौम्यं सितं स्निग्धं बल पुष्टिकरं स्मृतम् ।

गर्भबीजं वपुः सारो जीवस्याश्रयमुत्तमम् ॥

‘शुक्र (वीर्य) जीवनी शक्ति का बढ़ाने वाला, श्वेत-वर्ण, चिकना, बल तथा पुष्टिकारक होता है । यह गर्भ का बीज, शरीर का सार रूप तथा जीव का प्रधान आश्रय है ।’

१. वीर्य ही हृदय को पुष्ट बनाता है ।

२. वीर्य से ही सभी अंगों में जीवनी-शक्ति संचालित होती रहती है ।

३. वीर्य से ही मस्तिष्क शान्त और विचार-शक्ति से संपन्न रहता है ।

४. वीर्य से ही निर्भयता, पराक्रम, साहस, उत्साह आदि दिव्य गुणों की वृद्धि होती है ।

५. ‘ब्रह्मचर्य’ जीवन के भव्य भवन निर्माण की आधारशिला है ।

६. वीर्य ही सन्तानोत्पत्ति का मूल है ।

७. ब्रह्मचर्य ही अन्तःकरण की पवित्रता एवं शान्ति बनाए रखने में प्रधान कारण है ।

८. ब्रह्मचर्य ही सदैव स्वस्थ, प्रसन्न व सुखी रहने का अक्षुण्ण उपाय है ।

९. जीवन की सफलता, सुन्दर स्वास्थ्य, हृष्ट-पुष्टता के लिए ब्रह्मचर्य अमृत रूप है ।

१०. दीर्घजीवन का मूल कारण वीर्य-रक्षण ही है । मनुष्य बिना ब्रह्मचर्य धारण किये हुये, कदापि पूर्णायु नहीं हो सकता है ।

११. ब्रह्मचर्य ही सब प्रकार की उन्नति का प्रधान साधन है ।

१२. जो पूर्ण ब्रह्मचारी है, वह मनुष्य नहीं देवता है ।

१३. वीर्य से ही शारीरिक-परिश्रम करने की शक्ति प्राप्त होती है ।

14

Scanned with CamScanner

१४. वीर्यवान पुरुष पुरुषार्थी होता है, उसमें दैवीय गुण स्वतः प्रकट हो जाते हैं, उसकी बुद्धि बहुत प्रखर हो जाती है, उसके चित्त में एकाग्रता आ जाती है, वह शक्तिशाली, दृढ़निश्चयी तथा निरोगी होता है ।

१५. वीर्यशक्ति से ही द्वन्द्वों (सुख-दुःख, शीत-उष्ण आदि) को सहने की सामर्थ्य मिलती है ।

१६. ब्रह्मचर्य से बुद्धि कुशाग्र और स्मरण शक्ति तीव्र होती है ।

१७. संसार के समस्त सुख आयु के आधीन हैं और आयु ब्रह्मचर्य के अधीन है ।

१८. शरीर में वीर्य संरक्षित होने पर आँखों में तेज, वाणी में प्रभाव, कार्य में उत्साह एवं प्राण ऊर्जा में अभिवृद्धि होती है ।

१९. वीर्य-रक्षा से शरीर में फुर्ती व चैतन्यता रहती है, आलस्य तथा तन्त्रा नहीं आती है, बीमारियों के आक्रमण को रोकने की शक्ति आती है ।

२०. ब्रह्मचर्य के प्रभाव से बड़ी-से-बड़ी विपत्ति आने पर भी धैर्य नहीं छूटता, कठिनाइयों एवं विघ्न-बाधाओं का वीरता पूर्वक सामना करने की शक्ति मिलती है ।

२१. ब्रह्मचर्य से इन्द्रियाँ सबल रहती हैं, शरीर के अंग-प्रत्यंग सुदृढ़ रहते हैं, आयु बढ़ती है तथा वृद्धावस्था जल्दी नहीं आती है ।

२२. ब्रह्मचर्य ही तप, व्रत, नियम-संयम, योग-ज्ञान, चरित्र और विनय की जड़ है ।

इसीलिए भीष्म पितामह ने कहा है कि तीनों लोकों के साम्राज्य का भले ही त्याग कर देना अथवा इससे भी कोई उत्तम वस्तु हो, उसको भी छोड़ देना किन्तु ब्रह्मचर्य को भंग नहीं करना ।

Scanned with CamScanner

‘हस्त-मैथुन’ एक प्राणघातक रोग

यह एक महाविनाशकारी प्राणघातक रोग है और इस रोग से करीब ९९ प्रतिशत लोग ग्रसित हैं। कुशिक्षा और कुसंग के कारण अज्ञानतावश आज केवल मनोरंजन के लिए बालक एवं नवयुवक हस्त-क्रिया के द्वारा अपने ब्रह्मचर्य का नाश करके, बाल्यावस्था से ही नष्ट हो रहे हैं। अब न वे गृहस्थ-जीवन के लायक रह पा रहे हैं और न ही विरक्ति लायक; क्योंकि वीर्य ही इस शरीर का राजा है और इसके क्षीण होने से शरीर दुर्बल और निस्तेज हो जाता है। वीर्य की एक भी बूँद निकालने का मतलब है शरीर को निचोड़कर रस निकालना। अतः ‘बिन्दु-पात’ सब प्रकार की अवनति का मूल है।

इसीलिये हस्तमैथुन के द्वारा या और भी किसी माध्यम से जो लोग वीर्यपात करते हैं, वे सावधान हो जाँएँ क्योंकि वे बिल्कुल अपनी सत्य का वर्णन कर रहे हैं और ये अनिष्टकारी चेष्टा उन्हें पुनः मनुष्य शरीर प्राप्त नहीं होने देगी।

अतः अभी भी मौका है सँभलने का। बिन्दु-नाश करना बिल्कुल बंद कर दो अन्यथा यह कुकृत्य तुम्हें जर्जर कर देगा, निकृष्टभावना से युक्त कर देगा, उत्साहहीन और खोखला कर देगा। तुम्हारी पारमार्थिक या व्यवहारिक अवनति का प्रधान कारण भी यही हस्त-मैथुन क्रिया है। गृहस्थ में तो जब पति-पत्नी का संयोग होता है, तब वीर्यपात होता है किन्तु इस हस्त-क्रिया के द्वारा लोग इसमें प्रतिपल जल रहे हैं, मर रहे हैं। ये क्रिया इतना कमजोर और परास्त कर देगी कि आप भगवन्मार्ग पर भी नहीं चल सकते हो क्योंकि ‘आरोग्यमूलं खलु धर्मसाधनम्’ नीरोग व्यक्ति ही भजन-साधन कर पाता है।

16

Scanned with CamScanner