ब्रह्मचर्य विज्ञान
Brahmacharya Vigyaan
पं. जगन्नारायणदेव शर्मा द्वारा
स्रोत: Sarvahitkari Grantha Mala · Sarvahitkari (उद्गम)
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है। यदि कोई अधिकारी मुदा इस विषय में अपनी नेजगिनी प्रतिभा का परिचय देता, तो मेरे विचार से विशेष उपकार की सम्भावना तथा सन्तोष की बात थी, और अन्य भी साहो-पाह पूरे हो पाता। इसलिये मैं महाकवि कालिदास के कण्ठ से कण्ठ मिलाकर, निम्नलिखित उक्ति कह कर, आपनी धुएना के लिये स्वयं विलजित हूँ—
क सूर्यप्रभवो वंशः, फलापविषया गतिः ।
नितीर्णुर्दुस्तरं मोनाद्वयुपेनादि नागरम् ॥ (शुभंश)
कहाँ अन्नचर्य जैसा सारगमित एवं हिन्दू विषय और कहाँ मैं हिन्दी का एक अल्पत्र तथा साधारण लोह लिखने वाला ! अतएव मैंने जो पुस्तक रचनामयी बटुनई (होटी नाच) पर चढ़ कर अन्नचर्य जैसे महासमुद्र के पार जाने का यत्न किया है, उसके लिये पाठकों से क्षमा-प्रार्थना करता हूँ।
इस ग्रन्थ को मैंने बड़े उत्साह और परिश्रम के साथ लिखा है। प्रचुर समय इसके चिन्तन और मनन में लगाया है। पर जिस रूप में इसे उपस्थित करना चाहता था, उस रूप में न हो सका। अभी मुझे इस समग्र्य में इससे भी अधिक अवलोकन तथा सद्गुण की आवश्यकता थी, जो समयाभाव के कारण असह्य जान पड़ने लगी। इसलिये मैंने जो कुछ हो, जैसा कुछ हो, इसे लिख डालने को ही उचित समझा।
हमारी हिन्दी-भाषा में उच्च विषयों के मौलिक ग्रन्थों