भारतकोश
ब्रह्मचर्य विज्ञान

ब्रह्मचर्य विज्ञान

Brahmacharya Vigyaan

पं. जगन्नारायणदेव शर्मा द्वारा

स्रोत: Sarvahitkari Grantha Mala · Sarvahitkari (उद्गम)

DevanagariHindipublished380 पृष्ठ

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का अभी एक प्रकार से अभाव ही समझना चाहिये। चरित्र सम्बन्धी तथा धार्मिक शिक्षावाले ग्रन्थों की तो नितान्त कमी है। अतः मुझे विश्वास है कि इस ग्रन्थ से वात्क-वाहिकायें, युवक-युवतियाँ तथा अनेक पुस्तक-खियाँ— प्रायः सभी लोग अपने चरित्र-निर्माण में कुछ न कुछ अवश्य सहायता पा सकेंगे। जो लोग ब्रह्मचर्य की वास्तविक महिमा न जान कर, घोर अन्धकार में भटक रहे हैं, बहुत सम्भव है, वे भी इसे पढ़कर प्रकाश में आने के लिये उत्सुक हो जायें।

मैंने इस ग्रन्थ का नाम 'ब्रह्मचर्य-विज्ञान' रखा है। जो बातें इसमें दिसलाई गई हैं, वे प्रायः वैज्ञानिक और आध्यात्मिक विचारों की सत्यता पर ही रह गई हैं।

यह सम्पूर्ण ग्रन्थ सात खण्डों में विभक्त किया गया है। मैंने इन खण्डों में ब्रह्मचर्य की प्राचीन मर्यादायें, वर्तमान-कालिक दोषों एवं आगे के लिये सुधार सम्बन्धी विचारों को दर्जाने की चेष्टा की है। फिर भी—

“दृष्टं किसपि लोकेस्मिन्नित्योपं नच निर्गुणम् । ( सूक्ति )

इस संसार में कोई वस्तु दोष-हीन और गुण-नहित नहीं देखी गई। अर्थात् सब में कुछ न कुछ दोष तथा कुछ न कुछ गुण अवश्य होता ही है।

“सर्तं ततो ग्राह्यमापत्य फल्गु—

हंसैर्यथा चौरमिवाम्बुमश्चात् ।” ( हितोपदेश )