भारतकोश
ब्रह्मचर्य विज्ञान

ब्रह्मचर्य विज्ञान

Brahmacharya Vigyaan

पं. जगन्नारायणदेव शर्मा द्वारा

स्रोत: Sarvahitkari Grantha Mala · Sarvahitkari (उद्गम)

DevanagariHindipublished380 पृष्ठ

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पतद्वय जिस प्रकार से इस जल में से दूध ग्रहण कर लेता है, उसी प्रकार किसी पदार्थ के द्रवित अंश को छोड़ कर, उसके सार को शपनाना उचित है ।

अतः पाठकों से नम्र निवेदन है कि इस ग्रंथ के दोनों पर ध्यान न देकर, इसके सार को ग्रहण करें ।

जो वेश—जो समाज-दुःख-दार्दिनी दासत्व-शृङ्खला से अपनी मुक्ति चाहता है—जो धर्म अपनी विजय-नैजवन्ती भूमण्डल में उड़ाना चाहता है—जो जाति अपनी पतिततावस्था से उथाना चाहती है—जो राष्ट्र अपने को सर्वोच्च बनाना

बाहता है—उसके लिये ब्रह्मचर्य ही महामन्त्र और अमोघ श्रद्धा है। ब्रह्मचर्य के अतिरिक्त सुख-शान्ति का साधक दूसरा उपाय कहाँ है ही नहीं। जो जाति ब्रह्मचर्य के महत्त्व को नहीं जानती, वह अधिक दिनों तक नहीं जी सकती। नृत्तक से मृतक जाति भी ब्रह्मचर्य-रूपी-अमृत पान कर के संसार में अमर हो जाती है।

हमारी हिन्दू-जाति के खो-पुखो ! आप लोग अपने दिव्य तथा ईश्वर-कल्प ऋषि-महर्षियों के लिये हुये अमृत को क्यों नहीं पीते ? हम सब्जता और भन्तराला को साजी देकर फहते हैं कि एक शताब्दी के विधिवत् ब्रह्मचर्य के पालन से आपके कई शताब्दियों के दोष दूर हो सकते हैं। आप पुनः अपनी आर्य-संस्कृति का अबाध प्रचार कर के, अनर्थता का नाश कर सकते