भारतकोश
ब्रह्मचर्य विज्ञान

ब्रह्मचर्य विज्ञान

Brahmacharya Vigyaan

पं. जगन्नारायणदेव शर्मा द्वारा

स्रोत: Sarvahitkari Grantha Mala · Sarvahitkari (उद्गम)

DevanagariHindipublished380 पृष्ठ

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चौर्य-नाश के प्रधान कारण

यह वेश्या रूप-ईश्वर से सजाई हुई कामाग्नि की ज्वाला होती है। कामी पुरुष इसमें अपने जीवन और धन की आहुती देते हैं।

आज कल जहाँ जाइये, वहाँ वेश्याओं की दृष्टि होती देख पड़ेगी। इससे अनुमान होता है कि इनके चाहने वालों की संख्या भी बढ़ रही है। वेश्याओं से चढ़े-चढ़े नगरों का शोभा बढ़ाई जाती है।

हमारे देश में अज्ञानता का सत्राज्य तो है ही। धनी लोग प्रायः लाइ-प्यार के मारे तथा धन के सद में आकर अपने पुत्रों की ब्रह्मचर्य तथा विद्या से विहीन रखते हैं। इसका यह परिणाम होता है कि उनके बालक बाल्यावस्था से ही कुसङ्ग में पड़ कर विचार-भ्रष्ट हो जाते हैं। वे ही कुल दिनों में युवक हो कर, वेश्या लय में जाने लग जाते हैं। वहाँ वेश्यायें भी इनको अपने माया-जाल में फँसाने के लिये सदा तत्पर रहती हैं। जो युवक एक बार भी इनके संसर्ग में पड़ा, वह जीवन पर्यन्त छूट नहीं सकता। इनके समागम से गर्मी, सुजाक, पथरी, राजयहमा और प्राण-नाशक भयङ्कर रोग उत्पन्न हो जाते हैं। इनके संसर्ग से घर की स्त्री को भी इनके रोग लग जाते हैं। यदि सन्तान हुई, तो वह भी अत्यन्त विकारों युक्त होकर इनके कुकर्मों का फल भोगती है। इन वेश्याओं के कारण अनेक बेरा नष्ट हो गये।

वेश्याओं के प्रचार का एक कारण वनका नृत्य भी है। हमारे बहुत से अज्ञानी भाई इनके नृत्य के विना विवाह या किसी प्रकार के उत्सव को अच्छा ही समझते हैं। इनके हावभाव तथा कटाक्ष पर कितने ही अच्छे पुरुष मोहित होकर भ्रष्ट होते हैं। इनके