ब्रह्मचर्य विज्ञान
Brahmacharya Vigyaan
पं. जगन्नारायणदेव शर्मा द्वारा
स्रोत: Sarvahitkari Grantha Mala · Sarvahitkari (उद्गम)
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वीर्य-नाश के प्रधान कारण
हमारे मत से वेरया-गमन पर-स्त्री-गमन में विशेष अन्तर नहीं। जो अपनी स्त्री से भिन्न है, वही पर-स्त्री कही जाती है। ऊपर की महामति मनु की सम्मति से विदित होता है कि पर-स्त्री-गमन बहुत ही दुष्ट है। वात्सव में ऐसा ही है। पर-स्त्री-गामी पुरुष निर्बल, निस्सन्तान, दुष्ट, गुप्त पापी, हठी, क्रूर, अल्पानु और महानिन्दित हो जाता है। पर स्त्री के प्रेम में रत रहने वाला अपनी पत्नी को कभी तुष्ट नहीं कर सकता। जो पति अपनी विवाहिता स्त्री पर ससृचित प्रेम नहीं रखता, उसकी स्त्री भी पर-पुरुष से मिल जाती है। इस प्रकार स्त्रियों का पातिव्रत धर्म नष्ट हो जाता है। और पुरुष भी अपने परमोत्तम एक पत्नी-वृष का नाश कर देता है। पर-स्त्री-गामी पुरुष अन्त में वेरयागामी भी हो जाता है। पुरुष हो या स्त्री, जिसका सदाचार दूष्ट जाता है, उसका मन फिर सधत्ता कठिन होता है। अब पाठक भली भाँति समझ गये होंगे कि ऊपर कहे गये दोनों दोषों से भी हमारी जाति का वीर्य, तेज, धर्म तथा धन नष्ट हो रहा है।
अब हम पर-स्त्री-गमन से होने वाली कुछ हानियों का वर्णन करते हैं:—
- (१) पर-स्त्री-गामी की स्त्री कर्कशा और दुष्टा हो जाती है।
- (२) पर-स्त्री-गामी के घर में कभी शान्ति नहीं रहती।
- (३) उसका रहस्य खुलने पर संसार में चोर निन्दा होती है।
- (४) उन्नत पुरुष भी पर-स्त्री के प्रेम से दिन पर दिन ध्वनित हो जाता है।
- (५) उसके चरित्र पर कभी अपनी या पर-स्त्री भी विश्वास नहीं करती।