भारतकोश
ब्रह्मचर्य विज्ञान

ब्रह्मचर्य विज्ञान

Brahmacharya Vigyaan

पं. जगन्नारायणदेव शर्मा द्वारा

स्रोत: Sarvahitkari Grantha Mala · Sarvahitkari (उद्गम)

DevanagariHindipublished380 पृष्ठ

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प्रसन्चर्य-विज्ञान

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अतः समाज सुधारकों में हमारी यही विनय है कि यदि आप कुछ वास्तविक सुधार करना चाहते हैं, तो जाति के नव युवकों को वैश्यागमन तथा पर-ख्री-गमन जैसे वीर्य-नाशक कार्यों के रोकने का यथाशक्ति प्रयत्न करें।

(५) अति मैथुन

अति खीसम्प्रयोगाच्छ, रक्षोद्वात्मनमात्मवान् । क्रीड्यामपि मेधावी, हितार्थो परिचञ्चेयत् ।

( वैष्णव )

सावधान मनुष्य को उचित है कि अत्यन्त ख्री-प्रसङ्ग से अपने को बचाये रहे। अपना भला चाहने वाला बुद्धिमान् पुरुष क्रीड़ा ( ख्री-विहार ) में भी अति प्रसंग ( अत्यन्त वीर्य-पात ) को त्याग दे।

बहुत से लोग ऐसे हैं, जो नैश्य-गमन और पर-स्त्री-गमन को ठुरा समझते हैं, पर अपनी स्त्री के साथ अति मैथुन को ठुरा नहीं समझते। उनकी धारणा है कि अपनी स्त्री के साथ विशेष-रमण करना पाप नहीं। वह तो इसी लिये है ही। ऐसे विचार वालों से हमारा नश्र निवेदन है कि अति मैथुन सर्वथा निन्दित है। वह भी एक प्रकार का व्यभिचार है। असमय में वीर्य-पात से कुछ लाभ नहीं होता, प्रत्युत ब्रह्म-हत्या का पाप लगता है। वीर्य से ही बालक की उत्पत्ति होती है। हम पहले कह भी चुके हैं कि वीर्य में असंख्य कीट रहते हैं। अति मैथुन से उन सबों का दूषा नाश होता है। इसी कारण से वैष्णव-शास्त्र में अति मैथुनः