भारतकोश
ब्रह्मचर्य विज्ञान

ब्रह्मचर्य विज्ञान

Brahmacharya Vigyaan

पं. जगन्नारायणदेव शर्मा द्वारा

स्रोत: Sarvahitkari Grantha Mala · Sarvahitkari (उद्गम)

DevanagariHindipublished380 पृष्ठ

पृष्ठ 290, कुल 380 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 290

२८७

वीर्य नाश के प्रधान कारण

का निषेध किया गया है। अब हम अति मैथुन से होने वाले कई रोगों का वर्णन करते हैं:—

शूल कास्त ज्वर श्वलित, क शर्य पादुषामयद्वयः।

श्रुति व्यवथायाञ्जायन्ते, रोगाश्चाक्षेपकादयः ॥

अति मैथुन ( श्त्री-प्रसङ्ग ) से शूल, खाँसी, ज्वर, खास, दुर्बलता, पीलिया रोग, क्षय तथा आक्षेप आदि ( वातन्याधि ) रोग उत्पन्न हो जाते हैं।

(६) अनैसर्गिक मैथुन

श्त्री-प्रसङ्ग सृष्टि-विधान के अनुकूल माना गया है। प्राकृतिक नियमों के विरुद्ध अन्य उपायों द्वारा वीर्य-पात करने का नाम “अनैसर्गिक मैथुन” है। अज्ञान के कारण आजकल हमारे देश में कई प्रकार के कुमैथुनों का प्रचार हो गया है। इनमें पड़ कर जन-समूह का बड़ा भारी अहित हो रहा है।

कई अनैसर्गिक मैथुनों में से हम दी के नाम यहाँ देते हैं। एक का नाम गुदा-मैथुन और दूसरे का नाम हस्त-मैथुन है। हमारी आर्य-जाति में ये दोनों पहले नहीं थे। यदि प्राचीन काल में ये रहे होते, तो कुछ न कुछ चरलेख तो अवश्य मिलता। पर ऐसा कहीं भी नहीं देखने में आया।

एक ऐतिहासिक का कहना है कि इन दोनों मैथुनों के जन्म-दाता पाश्चात्य देश हैं। पहले पहल विदेशों में ही इनका प्रचार हुआ। फिर क्रमशः जो जो जातियों सक्षम-समय पर भारत में घुसी-उन्होंने के साथ इनका यहाँ भी प्रचार हो गया।