ब्रह्मचर्य विज्ञान
Brahmacharya Vigyaan
पं. जगन्नारायणदेव शर्मा द्वारा
स्रोत: Sarvahitkari Grantha Mala · Sarvahitkari (उद्गम)
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वीर्य नाश के प्रधान कारण
का निषेध किया गया है। अब हम अति मैथुन से होने वाले कई रोगों का वर्णन करते हैं:—
शूल कास्त ज्वर श्वलित, क शर्य पादुषामयद्वयः।
श्रुति व्यवथायाञ्जायन्ते, रोगाश्चाक्षेपकादयः ॥
अति मैथुन ( श्त्री-प्रसङ्ग ) से शूल, खाँसी, ज्वर, खास, दुर्बलता, पीलिया रोग, क्षय तथा आक्षेप आदि ( वातन्याधि ) रोग उत्पन्न हो जाते हैं।
(६) अनैसर्गिक मैथुन
श्त्री-प्रसङ्ग सृष्टि-विधान के अनुकूल माना गया है। प्राकृतिक नियमों के विरुद्ध अन्य उपायों द्वारा वीर्य-पात करने का नाम “अनैसर्गिक मैथुन” है। अज्ञान के कारण आजकल हमारे देश में कई प्रकार के कुमैथुनों का प्रचार हो गया है। इनमें पड़ कर जन-समूह का बड़ा भारी अहित हो रहा है।
कई अनैसर्गिक मैथुनों में से हम दी के नाम यहाँ देते हैं। एक का नाम गुदा-मैथुन और दूसरे का नाम हस्त-मैथुन है। हमारी आर्य-जाति में ये दोनों पहले नहीं थे। यदि प्राचीन काल में ये रहे होते, तो कुछ न कुछ चरलेख तो अवश्य मिलता। पर ऐसा कहीं भी नहीं देखने में आया।
एक ऐतिहासिक का कहना है कि इन दोनों मैथुनों के जन्म-दाता पाश्चात्य देश हैं। पहले पहल विदेशों में ही इनका प्रचार हुआ। फिर क्रमशः जो जो जातियों सक्षम-समय पर भारत में घुसी-उन्होंने के साथ इनका यहाँ भी प्रचार हो गया।