ब्रह्मचर्य विज्ञान
Brahmacharya Vigyaan
पं. जगन्नारायणदेव शर्मा द्वारा
स्रोत: Sarvahitkari Grantha Mala · Sarvahitkari (उद्गम)
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“गुदा-मैथुन” बालकों के साथ दुर्जयवहार करने को कहते हैं। यह दूषण विधार्थियों और अविवाहित पुरुषों में बहुत फैल रहा है। इसके कारण पुरुष बल-रहित हो जाता है। सन्तान उत्पन्न करने की शक्ति मारी जाती है। इन्द्रिय में उत्तेजना नहीं रहती। गुदा-मैथुनी पुरुष को स्वप्न-दोष, प्रमेह, शूल, संयमहर्षी, कौष्ठबन्धता, मन्दाग्नि, उरःक्षत और उपवर्द्ध जैसे रोग उत्पन्न हो जाते हैं। वह पुरुष थोड़े ही दिन में नाना प्रकार के रोगों का कोष बन कर अपनी जीवनलीला समाप्त कर देता है।
डाक्टर हिल साहब कहते हैं:—“हस्त-मैथुन वह जबरदस्त कुल्हाड़ा है जिसे आशानी युवक अपने ही हाथों अपने पैरों में मारता है और चेत तब होता है, जब कि हृदय, मस्तिष्क, आमाशय और मूत्राशय निर्बल होकर, स्वरमदोष, शीघ्रपतन, प्रमेह आदि कुछ रोग आ घेरते हैं और जननेन्द्रिय छोटी देही और निर्बल होकर ग्रहस्थ धर्म के सर्वथा अयोग्य हो जाती है।”
“हस्त-मैथुन” उस कुकर्म का नाम है, जो हाथ के द्वारा वीर्य-स्खलन का कारण होता है। इस दुर्जयसन का प्रचार नवयुवक विधार्थी तथा अविवाहित पुरुषों में विरोधतर हो रहा है। इस कुकृत्य के कारण बहुत से लोगों का सर्वनाश तक हो जाता है। जो इसमें पड़ जाता है, वह मर कर ही इससे छूटता है। हमने कई सद्वैधों के सूचीपत्रों में इस बुढ़ी क्रिया के करनेवालों के पत्र पढ़े हैं। प्रत्येक पत्र के पढ़ने से धृष्टा, दुःख तथा परम शोक हुआ। ऐसे पुरुष वैधों की शरण में जाते रहते हैं, पर-कुछ भी लाभ नहीं होता। इससे निम्नलिखित रोग उत्पन्न होते हैं:—
मूत्राशय निर्बल हो जाता है—धातु में चीखता आ जाती