ब्रह्मचर्य विज्ञान
Brahmacharya Vigyaan
पं. जगन्नारायणदेव शर्मा द्वारा
स्रोत: Sarvahitkari Grantha Mala · Sarvahitkari (उद्गम)
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वीर्य नाश के प्रधान कारण
है—टष्टि की कमी, श्रुधा, रुपा, मन्दाग्नि, स्वप्नोप, सूनी, वन्माद, बुद्धि-भ्रंश, च्यव, वरक्षत, कोष्ठ-बद्धता, शिरः पीड़ा तथा मधु मेह जैसे रोग उत्पन्न होते हैं।
अज्ञानता तथा कुसङ्ग के कारण बालक इस दुष्कर्म में प्रवृत्त हो जाते हैं। प्रारम्भ में तो इससे उन्हें सुख प्रतीत होता है, पर कुछ दिनों में इसके कारण होने वाली हानियाँ भी सूचित हो जाती हैं। यदि उसी समय यह अवगुण छूटा, तब तो कुछ सुधार भी हो जाता है। इससे जो रोग उत्पन्न होते हैं, वे स्थायी होते हैं।
अब पाठक भली भाँति समझ गये होंगे कि ऊपर कही गयी दो अनैसर्गिक क्रियायें, वीर्य-नाश के लिये पूरी राक्षसी सिद्ध हो चुकी हैं। अतएव हम शिष्टकों, विद्यार्थियों तथा बालकों के संरक्षकों से नम्रनिवेदन करते हैं कि वे पूर्ण रूप से इन दुर्न्यवहारों से होने वाली हानियों का वर्णन कर बालकों को जीवन-दान दें !
(७)—तामस तथा राजस भोजन
“कुभोजनं दुःखकरं न योग्यम्।”
( सृक् )
खुरे भोजन से दुःख प्राप्त होता है, इसलिये अयोग्य है।
सात्विक भोजन के विपरीत आहार का नाम तामस भोजन है। तामसी भोजन से मनुष्य में तमोगुण की वृद्धि होती है। इसीलिये शास्त्रों में इसका निषेध किया गया है।
यह बात सभी लोग जानते हैं कि जैसा आहार किया जाता