ब्रह्मचर्य विज्ञान
Brahmacharya Vigyaan
पं. जगन्नारायणदेव शर्मा द्वारा
स्रोत: Sarvahitkari Grantha Mala · Sarvahitkari (उद्गम)
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है, वैसी ब्राह्म भी उत्पन्न होती है। जिसकी बुद्धि अच्छी नहीं रहती, उसका मन बलात्कार दुरे कर्मों में लग जाता है। तामसी आहार करने वाले पुरुषों से वीर्य-रक्षा नहीं हो सकती। इसलिये ऐसे आहार से दूर रहना ही अच्छा है।
यातयामं गतरसं, पूतिं पर्युषितश्चयत् । उच्छिष्टमपिचामेधं, भोजनं तामसमियम् ॥
देर का बना हुआ, रस विहीन पदार्थ, दुर्गन्ध युक्त, लक्षण, प्याज, मछली तथा मांस आदि वासी और जूठा (अपवित्र) आहार तामस कहलाता है।
हमारे विचार से तामस के अतिरिक्त राजस आहार भी हमारे वीर्य-नाश का कारण बन रहा है। इस आहार के प्रेमियों के लिये वीर्य-संरक्षण बड़ा ही कठिन होता है।
अब हम राजस आहार का भी नीचे वर्णन कर देते हैं:—
कटुमल्लवश्यात्युष्ण, तीक्ष्ण रूचि विद्वादिनः ।
आद्यारा राजसस्येष्टा, दुःख शोकामयप्रदाः ॥
(गोलेपानिषत्)
अति कटु ( बहुत मिर्च वाला पदार्थ ) अति खट्टा, अत्यन्त नमकीन, अति तीक्ष्ण, बहुत गरमागरम, पदार्थ राई आदि मिश्रित बहुत रूखा और अत्यन्त दाह करने वाला आहार—राजस कहलाता है। इससे दुःख, शोक तथा रोग बढ़ता है।
जिह्वा की लोलुपता के कारण लोग तामस और राजस आहार से प्रेम करते हैं, पर यह नहीं जानते कि इससे आन्तरिक हानि होती है। अतएव वीर्य-रक्षकों से हमारा नम्र निवेदन है कि वे इन दोनों प्रकार के आहार पर संयम प्राप्त करें।