भारतकोश
ब्रह्मचर्य विज्ञान

ब्रह्मचर्य विज्ञान

Brahmacharya Vigyaan

पं. जगन्नारायणदेव शर्मा द्वारा

स्रोत: Sarvahitkari Grantha Mala · Sarvahitkari (उद्गम)

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विद्वानों के मत

भी जीवित हैं। हनुमान—‘मिसेन्द्रियं बुद्धिमतां वरिष्ठम् ।’ बुद्धिमान, त्यागी और वीर हुये हैं—मूल्य नहीं ! मैं चाहता हूँ कि इनकी मूर्तियों स्थान-स्थान पर खड़ी हो जायें। वहाँ वे ही जायें, जो लैंगोट के सच्चे ( ब्रह्मचारी ) हों। अर्जुन ने ब्रह्मचर्य के कारण ही विजय प्राप्त की थी।

( योगी अरविन्द )

अध्यात्म-विद्या से ही सच्ची स्थायीनता मिल सकती है ! मानसिक दुर्बलता को त्याग देना चाहिये । जो जाति अपनी संस्कृति को नहीं छोड़ती, वह पवित्र नहीं हो सकती ! ब्रह्मचर्य और योग ही सुख का मार्ग है । तपोव्रत से ही उत्थान होता है । ऋषियों के गृह रहस्यों को समझे ! उपनिषदों के उपदेशों पर चल कर ही मुक्ति मिल सकेगी !

( परमहंस रामकृष्ण )

यह संसार ही भ्राम्य है ! कुभासना के लिये स्थान ही कहाँ ! इस विचार से ब्रह्मचर्य के पालन में कठिनता क्या है ? माता स्वयं अपने पुत्रों की रक्षा करती है ।

( स्वामी सत्यदेव )

संसार वीर्यवान् के लिये है । वीर्यवती जातियों से संसार भर में राज्य किया ! और वीर्यहीन होने पर उनका अस्तित्व मिट गया ।