ब्रह्मचर्य विज्ञान
Brahmacharya Vigyaan
पं. जगन्नारायणदेव शर्मा द्वारा
स्रोत: Sarvahitkari Grantha Mala · Sarvahitkari (उद्गम)
पृष्ठ 371, कुल 380 में से
संदर्भ में पढ़ेंप्रसूचय-विज्ञान
३६८
यदि संसार में रह कर, अपने जीवन की सार्थकता को सिद्ध करने की आकांक्षा है, तो इस रत्न ( वीर्य ) की रक्षा करने में अपनी शक्तियों को लगा कर, इसके द्वारा वैवी गुणों को प्राप्त करने में कटिबद्ध रहना चाहिये !
❀
❀
❀
❀
( भारत-भीम 'रामसूति' )
भीमसेन तथा हनुमानजी के चित्र मेरे मानसिक पटल पर खिंच रहे थे । मैंने विचार किया कि उनके समान न सही, पर अपने शरीर को अवश्य ही पुष्ट बना सकता हूँ ।
भगवद्गीता तथा शुश्रुतादि आयुर्वेदीय ग्रन्थों का मैंने अवलोकन किया । अपने शास्त्रों के अध्ययन से मुझे शारीरिक उन्नति का सर्वोत्तम उपाय ब्रह्मचर्य सूक्त पड़ा ! मैंने और सब अभ्यासों को छोड़ कर उसी को ग्रहण किया और यह बात प्रकट कर दिखाई कि भीमसेन, द्रोणाचार्य आदि हमारे महामहिमान्निवर्त पूर्णजों के गौरव को बढ़ाने वाली, भारतवासियों की वही सर्वश्रेष्ठ ( वीर्य-रक्षण और प्राणायाम युक्त ) न्यायम-प्रणाली थी ।
❀
❀
❀
❀
( एक विद्यार्थी 'सरस्वती' )
वह कैसा उत्तम समय था, जब ऐसे ( भीष्म जैसे ) सदा-चारी पुरुष होते थे । आज चाहे हम अपनी मूर्खता से ब्रह्मचर्य पर उपहास करें, परन्तु समय आवेगा, जब संसार इन्हीं ( ब्रह्मचर्य के ) नियमों को पुनः ग्रहण करेगा !
❀
❀
❀
❀