भारतकोश
ब्रह्मचर्य विज्ञान

ब्रह्मचर्य विज्ञान

Brahmacharya Vigyaan

पं. जगन्नारायणदेव शर्मा द्वारा

स्रोत: Sarvahitkari Grantha Mala · Sarvahitkari (उद्गम)

DevanagariHindipublished380 पृष्ठ

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विद्यार्थी के मत

( एक दार्शनिक विद्वान् )

सदाचार संसार की सभ्यता का मूल है। ब्रह्मचर्य सदाचार का बीज है। इसके अभाव में कोई जाति अपने अधिक दिनों तक अस्तित्व नहीं रख सकती। बिलासिता वह राजसी है, जो उस चीज को निमूल करने में लगी रहती है।

( महात्मा ईसा मसीह )

परमात्मा के राख में भ्रिय बनने के लिये अविदाहित जीवन विताना धर्म है। संयम और पवित्रता से ब्रह्मचर्यमय रहने का ही सर्गाय आदेश है।

( महात्मा सुकरात )

संसार में मनुष्य को अपने जीवन निष्पाप ( व्यभिचार शून्य ) तथा उच्च सदाचार युक्त बनाने में ही वास्तविक सुख है।

( महात्मा टालस्टाय )

मेरा मत है कि मनुष्य-जाति में सुख-शान्ति को स्थापित रखने के लिये, पुरुष और स्त्री—दोनों को सम्पूर्ण ब्रह्मचर्य के पालन करने का उद्योग करना श्रेयस्कर है। दोनों को सावधानता तथा हृदता-पूर्वक इस संयमशीलाता का अभ्यास करना चाहिये। इसी प्रकार के आचरण से वे अपने उच्च उद्देश्य की सिद्धि करने में सक्षम होंगे। लक्ष्यवेध करने के समय अपने तीर को उससे