भारतकोश
ब्रह्मचर्य विज्ञान

ब्रह्मचर्य विज्ञान

Brahmacharya Vigyaan

पं. जगन्नारायणदेव शर्मा द्वारा

स्रोत: Sarvahitkari Grantha Mala · Sarvahitkari (उद्गम)

DevanagariHindipublished380 पृष्ठ

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महाचर्य-विज्ञान

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छुट्ट कर पर छोड़ना पड़ता है । ऐसा करने से ही बनैत अपने कार्य में सफल हो सकता है । उधो प्रकार मनुष्य को भी अपने जीवन का उद्देश्य ऊँचा रखना चाहिये, तभी उसे सच्ची सफलता मिल सकती है । यदि यह विषयभोग को ही अपना लक्ष्य बना होगा, तो वह अवश्य असफल हो जायगा—वह उस से नीचे गिर पड़ेगा । यदि मनुष्य शारीरिक आनन्द के लिये नहीं, बल्कि आत्मिक आनन्द के पाने के लिये सदैव प्रयत्न शील रहेगा, तो वह कहीं साधारण जीवन पर ठहर सकेगा । यदि वह पहले ही से विषयलोलुपता के कारण अपना साहस खो देगा, तो वह अत्यन्त पतित हो जायगा !

( डाक्टर जी० एम० वियर्ड )

जननेन्द्रिय, मस्तिष्क और पाकस्थली, इन तीनों में अति वलिष्ठ सम्बन्ध है । मानों ये तीनों एक ही सूत्र में ग्रथित हैं । पहली एक के कर्ण होने से पिछली दोनों भी रोग से नहीं बँच सकती ।

( डाक्टर पी. टी. डार्म )

वीर्य ही मनुष्य-शरीर का जीवन है । इसके बिगड़ने से रक्त का नाश होता है और अन्त में सुषरना असम्भव हो जाता है । इन्द्रिय सम्बन्धी सुखों में आचर्यकता से अधिक लगनेवाले ही भयङ्कर रोगों से घिरे रहते हैं ।