ब्रह्मचर्य विज्ञान
Brahmacharya Vigyaan
पं. जगन्नारायणदेव शर्मा द्वारा
स्रोत: Sarvahitkari Grantha Mala · Sarvahitkari (उद्गम)
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आवश्यक सन्देश
ऊपर के पाश्चात्य देश के कई दार्शनिक तत्त्ववेत्ताओं ने भी ब्रह्मचर्य के पालन में, मानव-जाति के सामाजिक उत्थान, गुणोदय एवं आध्यात्मिक आदर्शों के दर्शन किये हैं । यही कारण है कि उन्होंने अपने लेखों तथा ग्रन्थों में उसकी विवेचना करके, उस सत्य का सुक्त हृदय से समर्थन किया है ।
इनके अतिरिक्त बहुत से बड़े-बड़े डाक्टरों तथा लुक्मान, जालीनूस तथा बूभलीसोना आदि हकीमों ने भी दीर्घ-रक्षण की जित्मानी और रुग्नी ताकत के लिये आवश्यक माना है । और इन्द्रिय-निग्रह से इस अमूल्य पदार्थ को सुरक्षित रखने की बात : कही है । अतः इतने से ही सावधान हो जाना चाहिये !
४—आवश्यक सन्देश
आहार निद्रा-भय-मैथुनञ्च— सामान्य मेतत्पशुभिरनराणाम् । ज्ञानं हि तेषामधिको विशेषो, ज्ञानेन हीनः पशुभिः समानाः॥
आहार, निद्रा, भय और मैथुन—ये चारों मनुष्यों और पशुओं में समान रूप से विद्यमान हैं । पर मनुष्यों में ज्ञान विशेष रूप से अधिक है । इसीलिये मनुष्य संज्ञा हुआ है । जो लोग इससे हीन हैं, वे फिर पशु ही के तुल्य हैं ।
सारे प्राणियों में मनुष्य ज्ञानवान प्राणी है । वह तर्क-वितर्क द्वारा हितहित तथा कारण-कार्यों का निर्णय कर सकता है । इसीलिये वह सर्व-श्रेष्ठ माना जाता है ।
चौरासी लक्ष जीव योनियों में यह सब से श्रेष्ठ योनि मानव—