ब्रह्मचर्य विज्ञान
Brahmacharya Vigyaan
पं. जगन्नारायणदेव शर्मा द्वारा
स्रोत: Sarvahitkari Grantha Mala · Sarvahitkari (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंअसत्यचर्य विज्ञान
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शरीर है। इसलिये यह सब से मूल्यवान है। यदि इसे प्राप्त कर किसी प्रकार की असावधानी की गई, तो फिर कर्मोत्सार अनेक योगियों में भ्रमण करना पड़ता है, जिनमें प्राणी को सद्ब्रह्मन मिलाना बहुत कठिन है।
ऊपर कहा गया है कि मनुष्य सर्वश्रेष्ठ प्राणी है। वह क्यों ? ज्ञान के कारण—मानव-शरीर सब से मूल्यवान है। वह क्यों ? चौरासी लक्ष जीवन-योगियों में सब से उच्च होने से। यदि यह बात है, तो उसका जीवन भी सब से श्रेष्ठ होना चाहिये। यदि जीवन श्रेष्ठ है, तो फिर उसका उद्देश्य भी सर्वश्रेष्ठ होना चाहिये। और उस उद्देश्य तक पहुँचने के लिये श्रेष्ठ कर्म का भी होना आवश्यक ही नहीं, अनिवार्य है।
मनुष्य-जीवन का उद्देश्य क्या है, और उस तक पहुँचने के लिये फिर क्या उद्योग करना चाहिये ? वह हम नीचे लिखते हैं:—
मनुष्य जीवन का सत्य से बड़ा उद्देश्य है—सुख-शान्ति के साथ परमात्मन् परमात्मा को प्राप्त करना—और इसे साधने वाला सब से बड़ा कर्म है—संयमशील ब्रह्मचर्य। वस ! इसी उद्देश्य की प्राप्ति और इसी कर्म के करने के लिये वैदिक काल से प्रयत्न होता आ रहा है। मनुष्य-जाति के विविध मत-मतान्तरों के धर्म-ग्रन्थों का सार तत्व भी यही है। संसार में सब धर्मों के श्रुति-मुनियों ने भी अपने जीवन में इसी के लिये प्रयत्न किया है।
मनुष्य-जीवन का उद्देश्य, शक्ति और कृतिम सुख नहीं, जो कि विषोपभोग से मिलता है। वह तो पशुओं—नहीं, नहीं—बाघों का उद्देश्य और कर्म है। वास्तव में मनुष्य के गुण—