ब्रह्मचर्य विज्ञान
Brahmacharya Vigyaan
पं. जगन्नारायणदेव शर्मा द्वारा
स्रोत: Sarvahitkari Grantha Mala · Sarvahitkari (उद्गम)
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आवश्यक संदेश
सत्यनिष्ठा, शील, वल, विद्या, सदाचरण, परोपकार, साहस, तेज, उत्साह, सैधै, जीव-दया, विश्वभेम, भ्रातृ-भाव तथा सत्पु-धार आदि हैं। कायरता, द्वेष, दुष्म, असत्य, कलह, निन्दा, विवाद, हठ, अपकार, श्रम्याय, कृण्णाता, भय, हिनद्व-लोचुपता, असहिष्णुता तथा क्रोध आदि तो दुर्गुण ही कहे जायेंगे। गुणों के द्वारा ही सरकार करके सद्दुर्देश की खिड़ि हो सकती है। दुर्गुणों के वशीभूत होने से तो दुष्कर्म और पतन होता है।
महत्त्वपूर्ण के पात्रन में स्थायी सुख और सद्गुण वास करते हैं। विषयभोग तो क्षणिक आनन्द (जिसका फल दुःख होता है) और दुर्गुणों का घर है। एक अमृत-फल है तो दूसरा विष फल। पहले के खपने का परिणाम 'जीवन' और दूसरे का 'मरण' है। पहला स्वर्ग और दूसरा नरक में भेजनेवाला है।
आप जीवन के सार को समझ गये होंगे। अब आप अमर-फल खाकर स्वर्गीय सुख भोगना चाहते हैं या कटु विषक्त-फल खाकर नारकीय दुःख? आपकी अन्तरात्मा तो पहले की ही और है। दूसरे से सब की छूणा हांगी और यही उचित भी है। पर मनुष्य ईश्वरों के मोह में पड़ कर अपनी आत्मा की आवाज पर ध्यान नहीं देता और इसी लिये कष्ट पाता है। अतः हे पिताओं और भ्राताओं! आप लोग हनुमान, भीष्म, शङ्कराचार्य, दयानन्द और विवेकानन्द बनने का सदैव उद्योग करो! उसी प्रकार से माताओं और बहिनों! आप भी सरस्वती, वेदवती, अहन्धती, पार्वती और सीता का अनुकरण करो! यही हमारा आवश्यक तथा अतिम सन्देश है। शुभमस्तु !