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ब्रह्मचर्य विज्ञान

Brahmacharya Vigyaan

पं. जगन्नारायणदेव शर्मा द्वारा

स्रोत: Sarvahitkari Grantha Mala · Sarvahitkari (उद्गम)

DevanagariHindipublished380 पृष्ठ

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आवश्यक संदेश

सत्यनिष्ठा, शील, वल, विद्या, सदाचरण, परोपकार, साहस, तेज, उत्साह, सैधै, जीव-दया, विश्वभेम, भ्रातृ-भाव तथा सत्पु-धार आदि हैं। कायरता, द्वेष, दुष्म, असत्य, कलह, निन्दा, विवाद, हठ, अपकार, श्रम्याय, कृण्णाता, भय, हिनद्व-लोचुपता, असहिष्णुता तथा क्रोध आदि तो दुर्गुण ही कहे जायेंगे। गुणों के द्वारा ही सरकार करके सद्दुर्देश की खिड़ि हो सकती है। दुर्गुणों के वशीभूत होने से तो दुष्कर्म और पतन होता है।

महत्त्वपूर्ण के पात्रन में स्थायी सुख और सद्गुण वास करते हैं। विषयभोग तो क्षणिक आनन्द (जिसका फल दुःख होता है) और दुर्गुणों का घर है। एक अमृत-फल है तो दूसरा विष फल। पहले के खपने का परिणाम 'जीवन' और दूसरे का 'मरण' है। पहला स्वर्ग और दूसरा नरक में भेजनेवाला है।

आप जीवन के सार को समझ गये होंगे। अब आप अमर-फल खाकर स्वर्गीय सुख भोगना चाहते हैं या कटु विषक्त-फल खाकर नारकीय दुःख? आपकी अन्तरात्मा तो पहले की ही और है। दूसरे से सब की छूणा हांगी और यही उचित भी है। पर मनुष्य ईश्वरों के मोह में पड़ कर अपनी आत्मा की आवाज पर ध्यान नहीं देता और इसी लिये कष्ट पाता है। अतः हे पिताओं और भ्राताओं! आप लोग हनुमान, भीष्म, शङ्कराचार्य, दयानन्द और विवेकानन्द बनने का सदैव उद्योग करो! उसी प्रकार से माताओं और बहिनों! आप भी सरस्वती, वेदवती, अहन्धती, पार्वती और सीता का अनुकरण करो! यही हमारा आवश्यक तथा अतिम सन्देश है। शुभमस्तु !

ब्रह्मचर्य-विनय

( पद्म पदी छन्द )

मे ऋषियों का परम ध्येय दुःख दूरने वाला !

तेज तथा उत्साह-ज्ञान से भरने वाला ॥

तेरी महिमा जान मनुज होता है नामी ।

तू है जग का तत्त्व गुणों में है अभिरामी ॥

तेरी सेवा से सदा, मिलती सच्ची सुक्ति है ।

तुम्हसे बढ़ स्वातंत्र्य की, अपर न कोई युक्ति ॥

तू ही सब विज्ञान-ज्ञान का देने वाला ।

तू कर देता काम देव का है सुख काला ॥

तुम्ह से ही सब धर्म कर्म हैं उज्ज्वल होते ।

तुम्हें थार धीमान बीज उन्नति के होते ॥

तेरा यश त्रैलोक्य में, पावन और ललाम है ।

ब्रह्मचर्य ! मन में रमे, तुम्हको विनय-प्रणाम है ॥

कविगुप्तर

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नीचे लिखी पुस्तकें छप गई हैं

  • (१) हाथ की हठाने-खाने—(भक्त-नाथ रामभक्त जीव ५०००) यह बड़ा विरय है कि हमें ४० गाँवोंमें सेवकों की (३०००) लगभग दिया है। विदेशों और भिन्न के कलेजों के नामों लेकर कैसे टिक सका है, इससे कुल्लूओं का निर्धार कैसे हो सकता है और भावों के व्यंग्यशब्दों वषाव, पताये गये हैं। २५४ से ऊपर पृष्ठों की पुस्तक का मूल्य ॥३॥
  • (२) स्त्री और पुरुष—[महर्षि शास्त्रमण] ५४ १२६। मूल्य ॥२॥
  • (३) तामिळ वेद—[श्रीराम नामक सामीर ग्रंथ का अनुवाद] ८४ अध का वेद के बराबर उस अंत में आहर है। यहाँ और आगे पर पूरी विवेचन है। ५४ २४४ मूल्य ॥२॥

यह पुस्तकें छप रही हैं

  • (१) ध्यान-चरित्र—[महात्मा गाँधी लिखित] ५४ ४००। मूल्य लगभग १।

  • (२) दक्षिण अफ्रिका का संस्थापक, दूसरा भाग—[तीसह महात्मा गाँधी] ५४ अंतर्गत २४० मूल्य लगभग ॥२॥

  • (३) यूरोप का इतिहास दो भाग—५४ लगभग ७०० मूल्य १॥३॥

  • (४) भारत के स्त्री-वद—इसमें आप ५४ लगभग ४०० मूल्य १।

  • (५) गोरी का प्रमुख—[हैथड गाय रामचंद्र बना] ॥ The rising tide of colour against white world supremacy के आधार पर इस पुस्तक में यह दिसाया गया है कि संसार में कितने बड़े बंटा और आचारों पर पाँच जातियों ने किस दृष्टि से अधिकार बना रखा है और उनके भलाचारों से लोग आहत कितने प्रकार लोग स्वतंत्र होने का प्रयत्न कर रहे हैं। पुस्तक में यह प्रकार से समस्त संसार की राजनैतिक समझों का बहुत अच्छा विवेचन किया गया है। ५४ संख्या लगभग २४० मूल्य ॥२॥

  • (६) चीन की जांजात—यह दो भण्डों पुस्तकें—५४ लगभग १२३ मोड—ये सब पुस्तकें छप १९२७ के अंतिम भाग में प्रकाशित हो चुकी थीं।

पता—हस्ता-तालिस्-गण्डल, अजमेर

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