भारतकोश
ब्रह्मचर्य विज्ञान

ब्रह्मचर्य विज्ञान

Brahmacharya Vigyaan

पं. जगन्नारायणदेव शर्मा द्वारा

स्रोत: Sarvahitkari Grantha Mala · Sarvahitkari (उद्गम)

DevanagariHindipublished380 पृष्ठ

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ब्रह्मचर्य-विज्ञान का समर्थन

सो ब्रह्मचर्य को विज्ञान कह के ही पुकारा है। वास्तव में यह ज्ञात है भी ऐसी ही।

छान्दोग्योपनिषद् में लिखा है कि सब से पहले इस ब्रह्म (चर्य) विज्ञान का बोध ब्रह्माजी को हुआ। तत्पश्चात् उन्होंने इसका उपदेश कश्यप (प्रजापति) को दिया। फिर कश्यप जी ने मनु महाराज को इसका रहस्य बताया, और फिर मनुजी ने समस्त प्रजा को इसकी शिक्षा दी। इस के उपरान्त महामति अरुण ने उद्यालक ऋषि को इसका महत्त्व बताया।

फिर तो इस ब्रह्मचर्य-विज्ञान का सारे संसार में धीरे-धीरे प्रचार बढ़ता गया। पिता और आचार्य लोग अपने पुत्रों तथा प्राणप्रिय शिष्यों को वंश-परम्परा से इसका उपदेश करते गये। और इस के मानने वाले तथा इसके अनुकूल चलने वाले लोग दुःखों से छूट कर परम गति को प्राप्त हुये।

इस सम्बन्ध में एक बहुत ही उत्तम आख्यायिका है। वह इस प्रकार है:—

पुरुषश्चोक ऐतरेय ऋषि के तेजस्वी पुत्र महीदास इस 'ब्रह्मचर्य-विज्ञान' के अच्छे ज्ञाता थे। वे अपने शत्रुओं तथा दुष्ट प्रकृति वाले पलित पुरुषों से कहा करते थे कि तुम लोग मेरे ब्रह्मचर्य (विज्ञान) को न जानते हुये, मुझे क्यों कष्ट दे रहे हो। तुम्हारे दुःख देने से मेरी कुछ भी हानि न होगी, वरन् इससे तुम्हारा ही अन्तिष्ट होगा। क्योंकि मैंने पूर्ण ब्रह्मचर्य का पालन किया है। इस प्रकार इस विज्ञान के इन्द्रजाली महीदास ११६ वर्ष तक जीवित रहे, उन्हें किसी बात का भय न था। और उनका तर्क