भारतकोश
ब्रह्मचर्य विज्ञान

ब्रह्मचर्य विज्ञान

Brahmacharya Vigyaan

पं. जगन्नारायणदेव शर्मा द्वारा

स्रोत: Sarvahitkari Grantha Mala · Sarvahitkari (उद्गम)

DevanagariHindipublished380 पृष्ठ

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ब्रह्मचर्य-विज्ञान

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भी अग्निष्ट न हो सका। उन्हें कष्ट देने वाले पहले ही नष्ट हो गये; जो पुरुष इन महोदास का अनुकरण करेगा, वह भी दीर्घजीवी होगा।

हमारे कहने का तात्पर्य यह है कि आधुनिक समय में भी जा पिता या आचार्य, अपने पुत्र या शिष्य को इस सर्व-श्रेष्ठ (ब्रह्मचर्य) विज्ञान का रहस्य समझा देगा, वह अवश्य ही देश और जाति के सुधार का पुरुष प्राप्त करेगा।

२-ब्रह्मवचस और ब्रह्मलोक

“ब्रह्मभ्यावत्ते, तन्मेषच्छतुमुद्विषां, तन्मे ब्राह्मण-वचसम् ।”

(अथर्ववेद)

मैं ब्रह्म (वीर्य) की उपासना करता हूँ। वह मुझे बल दे और वह मुझे ब्रह्मवचस प्रदान करे।

जितने महाव्रत हैं, उनके पालन से उसके कर्त्ता को कुछ न कुछ फल अवश्य मिलता है। मनुष्य का स्वभाव ही ऐसा है कि वह निष्काम-कर्म की अपेक्षा सकाम-कर्म को अधिक पसन्द करता है। यदि फल की अशा न हो, तो अनुष्ठान के पूर्ण होने में भी सन्देह ही रहता है। यही बात ब्रह्मचर्य के साथ में भी घटती है। ब्रह्मचर्य का पालन जिन बड़े उद्देश्यों की सिद्धि के लिये किया जाता है, उन्हें हम प्रकट कर देना चाहते हैं। वे इस प्रकार हैं:—

अनेक ग्रन्थों में यह बात लिखी है—बहुत से वैदिक मन्त्रों में भी हम देखते हैं कि भाव-भरे मनोहर शब्दों में ‘ब्रह्मवचस’ के