ब्रह्मचर्य विज्ञान
Brahmacharya Vigyaan
पं. जगन्नारायणदेव शर्मा द्वारा
स्रोत: Sarvahitkari Grantha Mala · Sarvahitkari (उद्गम)
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ब्रह्मवर्चस् और ब्रह्मलोक
लिये प्रार्थना की गई है। मन्वादि स्मृतियों में भी यह बात स्पष्ट रूप से प्रतिपादित की गई है कि ब्रह्मवर्च्य के पालन का श्रेय ब्रह्मवर्चस की प्राप्ति है। इसी ब्रह्मवर्चस के लिये कोटि-कोटि महर्षि और मुनीश्वर लोग अखण्ड ब्रह्मवर्च्य की साधना करते रहे। कहने का वात्सय यह है कि ब्रह्मवर्चस को प्राप्त करने का ब्रह्मवर्च्य ही एकमात्र साधन था।
अथर्ववेद में 'ब्रह्मवर्चस' के सम्बन्ध के कई प्रमानोत्पादक मन्त्र हैं। उनमें से एक हम यहाँ उद्धृत करते हैं। उससे हमारी यह बात स्पष्ट हो जायगी:—
सूर्यस्यावृत मन्वावर्ते, दक्षिणा मन्वावर्ते। सामे द्विविर् यच्छतु, सामे ब्राह्मणवर्चसम् ॥
हम प्रकाश-स्वरूप परमात्मा का अनुगमन करते हैं। हम उसकी अनुकूलता की उपासना करते हैं। वह हमें बलप्रदान करे, वह हमें ब्रह्मतेज दे !
इस मन्त्र का अभिप्राय यह है कि हम सूर्य की भाँति शरीर को प्रकाशित करने वाले ब्रह्मवर्च्य का अनुष्ठान करते हैं। उसकी सत्ता का अनुमान करते हैं। वह हमें मनोबल दे—वह हमें ब्रह्मतेज प्रदान करे।
वात्सय में वीर्य ही मनुष्य-शरीर में सूर्य है। इसी के प्रताप से यह प्रकाशित होता है। जिस दिन इस परम प्रकाश का लोप हो जाय, उसी क्षण यह पौर तम से घिर जाता है। अर्थात् वीर्य के बिना शरीर का नाश होना निश्चित है।
ब्रह्मवर्च्य के पालन से ही मनुष्य को ब्रह्मवर्चस की उपलब्धि होती है। ब्रह्मवर्चस नाम है—आत्म-ज्ञान का। जब तक ब्रह्मवर्चस
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