भारतकोश
ब्रह्मचर्य विज्ञान

ब्रह्मचर्य विज्ञान

Brahmacharya Vigyaan

पं. जगन्नारायणदेव शर्मा द्वारा

स्रोत: Sarvahitkari Grantha Mala · Sarvahitkari (उद्गम)

DevanagariHindipublished380 पृष्ठ

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ब्रह्मचर्य-विज्ञान

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नहीं, सिद्ध होता, 'सब-तक 'ब्रह्मलोक' में आत्मा स्वतन्त्र होकर नहीं पहुँच सकता। अर्थात् एक 'साधन' की सिद्धि हो जाने से दूसरे सबूतय की भी सिद्धि होती है।

अब पाठक ब्रह्मचर्य कर रहा है, इसे तो समझ गये होंगे। इसके प्रश्नोत्तर 'ब्रह्मलोक' का भी थोड़ा परिचय कर देना चाहते हैं।

“तद्य एवैतं ब्रह्मलोकं ब्रह्मचर्येणानुविन्दते। तेषामेवैष ब्रह्मलोकस्तेषां स्वर्गेषुलोकेषु फामचारो भवति।” ( छान्दोग्योपनिषत् )

ब्रह्मचर्य से ही 'ब्रह्मलोक' की स्थिति है। ब्रह्मचर्य के ही द्वारा 'ब्रह्मलोक' मिलता है। ब्रह्मचारियों का ही 'ब्रह्मलोक' पर अधिकार है, अन्य का नहीं। जो ब्रह्मचर्य चुक पुलप हैं, वे सभी लोकों में विचरण कर सकते हैं।

इसका अभिप्राय यह है कि इस शरीर के ही अन्तर्गत 'ब्रह्मलोक' है। ब्रह्मचर्य की निष्ठा से आत्मा को वह अवस्था प्राप्त होती है। जिस ब्रह्मचारी को आत्मज्ञान प्राप्त हो जाता है, वह शरीर के भीतर के दूसरे लोकों में भी पहुँच सकता है। अर्थात् उसका अनुभव सब प्रकार के सद्भावों में परिणत हो सकता है।

'ब्रह्मलोक' आत्मा की वह अवस्था है, जिसमें वह परम सुख का अनुभव करता है। इस लोक में पहुँचने पर, उसे किसी प्रकार का दुःख नहीं मिलता। 'ब्रह्मलोक' सब लोकों से श्रेष्ठ है। यह सब से ऊपर मस्तिष्क में है। प्राणों के यह पहुँचने से जीव का मोच होता है। उसे फिर यहिक हृदयों से मुक्ति मिल जाती है। इसीसे 'ब्रह्मलोक' का आशय है—परमानन्द।

अब पाठक समझ गये होंगे कि चौर्य-सत्ता (ब्रह्मचर्य से) की