भारतकोश
ब्रह्मचर्य विज्ञान

ब्रह्मचर्य विज्ञान

Brahmacharya Vigyaan

पं. जगन्नारायणदेव शर्मा द्वारा

स्रोत: Sarvahitkari Grantha Mala · Sarvahitkari (उद्गम)

DevanagariHindipublished380 पृष्ठ

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प्राचीन आर्य और ब्रह्मचर्य

मनुष्य को आत्मज्ञान प्राप्त होता है, और आत्मज्ञान प्राप्त होने पर ही परमात्मन्द (ब्रह्मलोक) की प्राप्ति हो सकती है। इस अवस्था के प्राप्त होने पर, फिर कुछ भी प्राप्त करने के लिये शेष नहीं रह जाता।

हमारे विचार से यही 'ब्रह्मवचन' और 'ब्रह्मलोक' का मूल रहस्य है। इन दोनों के लिये प्रयत्न करना मनुष्य-जाति का प्रधान ध्येय होता चाहिये। जो लोग अपने जन्म को सार्थक करना चाहें, वे ब्रह्मचर्य रूढ़ी सुधुपाय को साथ कर 'ब्रह्मवचन' और 'ब्रह्मलोक'—'आत्मज्ञान' और 'परमात्मन्द' को अवश्य प्राप्त करें !

९—प्राचीन आर्य और ब्रह्मचर्य

मन्ये विधात्रा जगदेक कानम् । विनिर्मितं वर्षं भिदं सुशोभनम् ॥ धर्माख्यं पुष्पाणि कियन्ति यत्र वै । कैवलय रूपञ्च फलं प्रचीयते ॥

यह वात सब पर विदित है कि इस देश के निवासी आर्य नाम से विश्व-भरपल में विख्यात थे। उनकी इस महत्ता का कारण क्या था? उनका सदाचारमय-धर्मनिष्ठ-लोकोपकारी जीवन। वे निरन्तर साधुता-पूर्ण तथा सब चरित्र का अभ्यास करते थे। इस बात से वे बहुत उन्नत तथा सद्गुण-सम्पन्न थे। उनके जीवन को सुधारने वाला प्रधान साधन यही 'ब्रह्मचर्य' था। इसी ब्रह्मचर्य के ऊपर उनका सामाजिक तथा नैतिक जीवन प्रधानतया