ब्रह्मचर्य विज्ञान
Brahmacharya Vigyaan
पं. जगन्नारायणदेव शर्मा द्वारा
स्रोत: Sarvahitkari Grantha Mala · Sarvahitkari (उद्गम)
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अधिष्ठित था, और सारे देश में सुख-शान्ति का अनुपम साम्राज्य हो गया था। पर हाय ! महाभारत के साथ ही आर्यों के सस्ति-ख़ातों का हास होने लग गया। दिन पर दिन आर्यों की सब प्रकार की अवनति होती गई। अन्त में यह दशा हुई कि हम उन्हीं की एक मात्र सन्तान, उनके आदर्शों के शिखर से अनाचार के कूप में गिर गये। आर्यों के उन्नत चरित्र के सम्बन्ध में बहुत से विद्वानों ने अपने ग्रन्थों में सुसम्पत्तियों प्रकट की हैं। उनके देखने से हमें पूर्ण रूप से अनुमान हो जाता है कि कुछ ही दिन पहले, खदेड़ी शासन में हम, कितने गौरवान्वित तथा उच्च थे। हमारी ब्रह्मचर्य की प्रणाली ज्यों ज्यों अवनत होती गई, त्यों त्यों जाति की शारीरिक, मानसिक और आध्यात्मिक अवनति भी बढ़ती ही गई।
आर्यों के विषय में कहा गया है कि वे बड़े ऊँचे, हृद-पुष्ट और पराक्रमी थे। उनका वर्ण गौर, शरीर तेजस्वी, उन्नत वक्ष-स्थल और दिव्य सुख-मण्डल था। बड़े नेत्र और लम्बी भुजायें थीं। मुख में शूल्ता दिखलाते थे। धर्म-पालन में दृढ़ और ईश्वर के परम भक्त थे। उनको स्त्रियों सदाचारिणी, पति-भक्ता तथा देवी-स्वरूपा थीं।
ऊपर की बातों के अवलोकन से हमारे मनमें यह स्वाभाविक जिज्ञासा होती है कि वे ऐसे क्यों थे, और आज हम उन्हीं के वंशज होकर, इस दुर्गति को क्यों प्राप्त हैं ? इसका उत्तर यह सूझता है कि इन सब अवनतियों का प्रधान कारण ब्रह्मचर्य-हीनता है। ब्रह्मचर्य की साधना से आर्यों का प्राचीन समय में चत्थान हुआ था। और उसके विपरीत चलने से ही हमारा