भारतकोश
ब्रह्मचर्य विज्ञान

ब्रह्मचर्य विज्ञान

Brahmacharya Vigyaan

पं. जगन्नारायणदेव शर्मा द्वारा

स्रोत: Sarvahitkari Grantha Mala · Sarvahitkari (उद्गम)

DevanagariHindipublished380 पृष्ठ

पृष्ठ 48, कुल 380 में से

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प्राचीन आर्य और ब्रह्मचर्य

अघःपात हुआ। यदि उसी ब्रह्मचर्य-प्रथा को पुनर्जीवित कर दिया जाय, तो हमारे अनुमान से आर्यों की दशवीं पीढ़ी में पुनः आर्यों के वंशधर अपनी प्राचीन अवस्था को प्राप्त कर सकेंगे।

अब हम इस देश के प्राचीन आर्यों के चरित्र के सम्बन्ध में कुछ विदेशी विद्वानों के मतों का संग्रह करते हैं। इन विद्वानों में प्रायः सभी भारतवर्ष में आकर यहाँ की अवस्था अपनी आँखों देख गये हैं, और अपने देश में जोकर अपने ग्रन्थों में यहाँ का विस्तृत वर्णन किया है, तथा जो कुछ कहा है, उससे उनकी निष्पक्षता प्रकट होती है:—

जोर्जस—

“धर्म तथा सभ्यता के प्राचीनत्व के विचार से पृथ्वी की कोई भी जाति आर्य-जाति के समकक्ष नहीं।”

हयनसिंग—

“सबरिजता वा सत्यता के लिये आर्य-जाति चिरकाल से विषय में प्रसिद्ध है।”

मेगास्थनीज—

“आर्यों में दासत्व-भाव बिलकुल नहीं। उनकी स्त्रियों में पातित्रत्व और पुरुषों में वीरत्व असीम है। साहसिकता में आर्य-जाति पृथ्वी भर की अन्य जातियों में श्रेष्ठ है—परिग्रभी, शिल्पी तथा नग्न प्रकृति है।”

मैक्समूलर—

“जैसे पृथ्वी पर स्वर्ग कहने में भी मुझे आनन्द होता है। यदि कोई मुझसे कहे कि किस देश के आकाश के नीचे मनुष्य के अन्तःकरण की पूर्णता प्राप्त हुई, तो मैं कहूँगा कि वह देश भारतवर्ष है।”

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