भारतकोश
ब्रह्मचर्य विज्ञान

ब्रह्मचर्य विज्ञान

Brahmacharya Vigyaan

पं. जगन्नारायणदेव शर्मा द्वारा

स्रोत: Sarvahitkari Grantha Mala · Sarvahitkari (उद्गम)

DevanagariHindipublished380 पृष्ठ

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ब्रह्मचर्य-विद्यान

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मिसेज पर्नीवेसॅट—

“हिन्दु-धर्म के सामने पारवाल सम्भ्या अत्यन्त हीन ज्ञात होता है । ज्ञान की कृष्णी सदा से हिन्दुओं के हाथ में रही है ।”

अपर की सम्पातियों के अतिरिक्त इस देश के विद्वानों के भी अनेक सदूभाव हैं, जो यहाँ पर अनावश्यक समय कर नहीं दिये गये । क्योंकि स्वदेशी लोग अपने देश का पक्षपात भी थोड़ा-बहुत कर सकते हैं, पर विदेशी लोगों को इससे क्या काम ! अतः इस सम्बन्ध में उन्हें के विचार मूल्यवान हो सकते हैं ।

१७—धर्म और ब्रह्मचर्य

“धर्मोर्ध्व जगत्सुप्रहितमिदम् ।”

“धर्मो विभ्रत्य जगत्ः प्रतिष्ठा,

प्रजा उपसर्पन्ति धर्मेष ।”

( नारयणगीतम् )

धर्म से ही वह संसार सुरक्षित है । धर्म से ही इस दृष्टि की मर्यादा है । धर्म से ही प्रजा अपने उद्देश्य को प्राप्त कर सकती है ।

विचार-दृष्टि से देखने पर विदित होता है कि वास्तव में धर्म मनुष्य-जीवन के लिये अत्यन्त आवश्यक साधन है । धर्म से ही सब प्रकार की उन्नतियाँ हो सकती हैं । धर्म मनुष्य की उस योग्यता का नाम है, जिसके आश्रय से, वह अपने पद को सार्थक बनाता है । जैसे धरि का धर्म धन्वज—जल का वरलाल है,