ब्रह्मचर्य विज्ञान
Brahmacharya Vigyaan
पं. जगन्नारायणदेव शर्मा द्वारा
स्रोत: Sarvahitkari Grantha Mala · Sarvahitkari (उद्गम)
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धर्म शौर्य ब्रह्मचर्य
वैसे ही इस शरीका धर्म संयम-नियम और आत्मा, का ब्रह्मचर्य है। जो पदार्थ अपने धर्म को छोड़ देता है, वह उसी समय अपने अस्तित्व को भी खो बैठता है।
उक्तंति निखिला ज्ञावा, धर्मैरेव कृमादिह।
विदधानाः सावधानाः, लभन्तेऽन्ते परं पदम्॥
(महर्षिः व्याख्या)
इस लोक में समस्त जीव धर्म से ही विकास को प्राप्त करते हैं। धर्म के नियमों को पालने वाले, और उसके साधन में सामान्य रहने वाले नर ही अन्त में उत्तम पद के अधिकारी होते हैं, अन्य नहीं !
महर्षि कृष्णद ने अपने ग्रन्थ में धर्म की बहुत ही विख्यापक तथा अकाट्य परिभाषा की है, जो सदा और सर्वत्र एक सी घटती है, उसे हम यहाँ देते हैं :—
“यतोऽभ्युदय निः श्रेयस सिद्धिः सधर्मः।”
(बैशोपिकदर्शन)
जिस उपाय के अवलम्बन से इस लोक तथा परलोक दोनों का सुख प्राप्त हो, उसे धर्म कहते हैं। इसके विपरीत अधर्म है। ‘अभ्युदय’ नाम है—ऐहिक उन्नतियों का। सुन्दर स्वास्थ्य, दीर्घ-जीवन, प्रचुर-सम्पत्ति, सुख्य तथा अच्छी सन्तान को ही लोग इसलोक की उन्नतियों में गिनते हैं। ये सभी उन्नतियाँ ‘ब्रह्मचर्य’ के अधीन हैं। एक ब्रह्मचारी पुरुष—इन सबों को सहज में प्राप्त कर लेता है।
‘निःश्रेयस’ नाम है—पारलौकिक विकास का। आत्मानन्द, जीव-बुधा, परमोत्साह, उच्च कर्तव्य-शीलता, सद्भावना और